फील्ड मार्शल करिअप्पाफील्ड मार्शल करिअप्पा

फील्ड मार्शल करिअप्पा यह वह नाम हैं जिसको भारत ही नहीं पाकिस्तान में भी सम्मान की नजर से देखा जाता था।  1965 के युद्ध की बात है. भारत की सेना पाकिस्तान पर हवाई हमला कर रही थी. ऐसे ही एक हमले में पाकिस्तान आर्मी ने एक भारतीय वायु सेना के पायलट का विमान गिरा दिया. जब पायलट की पहचान की गई, तो दुश्मन देश में खलबली मच गई. पता चला कि हिरासत में लिया गया पायलट भारत के पूर्व आर्मी अफसर का बेटा है. खुद पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब ख़ां ने उस पायलट के पिता को संदेश भिजवाया. जिसमें कहा गया कि पाकिस्तान पायलट को तुरंत छोड़ने को तैयार है. इस प्रस्ताव पर जवाब मिला, ‘वो मेरा बेटा नहीं है. वो भारत देश का बेटा है या तो सभी बंदियों को रिहा करो या किसी को नहीं. मेरे बेटे को कोई स्पेशल ट्रीटमेंट मत दो.’

यह शब्द थे फील्ड मार्शल कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा के. साल 1949 में 15 जनवरी को करिअप्पा भारत के सेनाध्यक्ष बने थे. यह वो मौका था जब पहली बार भारतीय थल सेना की कमान एक भारतीय को सौंपी गई थी. तब से हर साल इस दिन को आर्मी डे के रूप में मनाया जाता है. के.एम. करिअप्पा को ऐसी कई मिसालों के लिए जाना जाता है, जो पहली बार हुईं.

कई मायनों में बनें मिसाल

कोडंडेरा करिअप्पा का जन्म 1899 में कर्नाटक में हुआ था. उन्हें लोग किप्पर के नाम से भी जानते हैं. बताया जाता है कि यह नाम एक ब्रिटिश अफसर की पत्नी ने दिया था. जिन्हें करिअप्पा नाम लेने में बहुत दिक्कत होती थी.

प्रथम विश्व युद्ध के खत्म होने के तुरंत बाद करिअप्पा ब्रिटिश भारतीय सेना में शामिल हो गए. बतौर अस्थायी सेकंड लेफ्टिनेंट के रूप में उन्होंने 1919 में सैन्य सफर की शुरूआत की. करिअप्पा दुनिया का नक्शा बदल देने वाली कई लड़ाईयों का हिस्सा रहें. इस दौरान वो कई बार विदेश गए. 1947 तक उनकी पोस्टिंग इराक, बर्मा, सीरिया और ईरान में हो चुकी थी. इस बीच करिअप्पा को ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश एम्पायर का सम्मान मिला. 1942 में वो पहले भारतीय अफसर बने जिन्हें यूनिट का कमांड मिला था. इसके अलावा 1947 में वो पहले भारतीय सैनिक बने जिन्हें इंपीरियल डिफेंस कॉलेज, यूके के ट्रेनिंग कोर्स में चुना गया.

कैसे हुआ पहले भारतीय सेनाध्यक्ष का चुनाव?

फील्ड मार्शल करिअप्पा को पहला भारतीय कमांडर-इन-चीफ चुने जाने के पीछे भी एक किस्सा बताया जाता है. करिअप्पा से पहले ब्रिगेडियर नाथू सिंह को भारत का पहला कमांडर-इन-चीफ पर विचार चल रहा था. 1946 में अंतरिम सरकार में रक्षा मंत्री रहे बलदेव सिंह ने नाथू सिंह को इसकी पेशकश भी की थी. लेकिन ब्रिगेडियर ने इस पेशकश को स्वीकार नहीं किया. उनका मानना था कि वरिष्ठ होने के कारण करिअप्पा का उस पद पर दावा ज्यादा बनता था.

मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी अपनी किताब ‘फील्ड मार्शल के एम करिअप्पा हिज़ लाइफ एंड टाइम्स’ में लिखते हैं, ‘नाथू सिंह के बाद राजेंद्र सिंहजी को भी ये पद देने की पेशकश हुई. लेकिन उन्होंने भी करिअप्पा की वरिष्ठता और सम्मान और में उस पद को स्वीकार नहीं किया.’ 4 दिसंबर, 1948 को करिअप्पा को सेना का पहला भारतीय कमांडर-इन-चीफ बनाया गया. 15 जनवरी, 1949 को लेफ्टिनेंट जनरल सर रॉय बुचर को हटाकर करिअप्पा ने भारतीय सेना के कमांडर-इन-चीफ के पद को गृहण किया.

पाकिस्तान के सैनिकों ने किया सेल्यूट

के.एम. करिअप्पा साल 1953 में सेना से रिटायर हो गए. बाद में उन्हें ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में राजदूत बनाया गया. सेवानिवृत्ति के बाद करिअप्पा कर्नाटक के कोडागू जिले के मदिकेरी में बस गए.

1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध खत्म होने के बाद करिअप्पा भारतीय जवानों का मनोबल बढ़ाने सीमा पर गए थे. इस दौरान उन्होंने सीमा पार कर दोनों देशों के बीच के ‘नो मैन लैंड’ में प्रवेश कर लिया. फील्डमार्शल करिअप्पा के बेटे एयर मार्शल नंदू करिअप्पा अपने पिता की जीवनी में लिखते हैं,’उन्हें देखते ही पाकिस्तनी कमांडर ने आगे न बढ़ने की चेतावनी दी. इस बीच भारतीय सीमा से किसी ने चिल्ला कर कहा ये जनरल करिअप्पा हैं. ये सुनते ही पाकिस्तानी सिपाहियों ने अपने हथियार नीचे कर लिए.’ यहीं नहीं, पाकिस्तान के अफसर ने आ कर जनरल करिअप्पा को सेल्यूट भी किया.

भारत सरकार ने साल 1986 में करिअप्पा को फील्ड मार्शल का पद दिया. भारत की सेना के 70 साल लंबे इतिहास में केवल दो अफसरों को ही फील्ड मार्शल की रैंक मिली है. करिअप्पा के अलावा 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान भारतीय सेना के सेनाध्यक्ष रहे सैम मानेकशॉ को फील्ड मार्शल की रैंक दी गई है.

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