संत रविदाससंत रविदास

दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में बुधवार को संत शिरोमणि सद्गुरु रविदास पर व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम में केंद्रीय कानून एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। वक्ताओं ने संत रविदास के दर्शन, सामाजिक समरसता और समानता के विचारों पर चर्चा की।

अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (ABRSM), दिल्ली प्रदेश ने इस कार्यक्रम का आयोजन किया। इसमें दिल्ली विश्वविद्यालय और अन्य शैक्षणिक संस्थानों के शिक्षकों, प्राचार्यों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों सहित 600 से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया।

अर्जुन राम मेघवाल ने संत रविदास के विचारों को बताया प्रासंगिक

मुख्य अतिथि अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि संत रविदास के विचार समानता और जनकल्याण पर आधारित हैं। उन्होंने कहा कि इन विचारों की प्रासंगिकता वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी बनी हुई है।

मेघवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं का उल्लेख किया। इनमें प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना, आयुष्मान भारत, जन धन योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना और अंत्योदय से जुड़ी पहल शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि इन योजनाओं का उद्देश्य आम लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करना है। उनके अनुसार, संत रविदास के दर्शन में सामाजिक समानता और वंचित वर्गों के कल्याण का महत्वपूर्ण स्थान है।

संविधान और समानता के मूल्यों पर चर्चा

मेघवाल ने भारतीय संविधान में समानता से जुड़े प्रावधानों का भी उल्लेख किया। उन्होंने संत रविदास के विचारों और डॉ. भीमराव आंबेडकर के संवैधानिक दृष्टिकोण के बीच वैचारिक संबंधों पर अपनी बात रखी।

उन्होंने कहा कि समाज में समानता और मानवीय गरिमा को मजबूत करना आवश्यक है। संत रविदास की वाणी इन मूल्यों को समझने में प्रेरणा देती है।

हनुमान सिंह राठौड़ ने सामाजिक समरसता पर दिया जोर

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, अजमेर के अध्यक्ष हनुमान सिंह राठौड़ रहे। उन्होंने संत रविदास की शिक्षाओं और भारतीय भक्ति परंपरा के सामाजिक योगदान पर विचार रखे।

राठौड़ ने कहा कि संतों ने प्राचीन ज्ञान और मूल्यों को जनसामान्य तक पहुंचाने के लिए लोकभाषाओं का सहारा लिया। इससे उनके विचार व्यापक समाज तक पहुंचे।

उन्होंने कहा कि संत रविदास ने अपनी वाणी और सामाजिक संदेशों के माध्यम से समरसता को बढ़ावा दिया। उनके विचार आज भी सामाजिक विभाजन को कम करने और आपसी सम्मान बढ़ाने के संदर्भ में प्रासंगिक हैं।

संत रविदास की शिक्षाओं का सामाजिक महत्व

राठौड़ के अनुसार, संत रविदास की शिक्षाएं जाति और संप्रदाय से परे समाज की कल्पना प्रस्तुत करती हैं। उन्होंने ऐसे सामाजिक वातावरण की जरूरत पर जोर दिया, जिसमें सभी लोगों को सम्मान और समान अवसर मिलें।

कार्यक्रम में राठौड़ द्वारा लिखित पुस्तक ‘संत शिरोमणि सद्गुरु श्री रविदास’ का विमोचन भी किया गया। पुस्तक में संत रविदास के विचारों, सामाजिक जीवन और उनके योगदान के विभिन्न पहलुओं को प्रस्तुत किया गया है।

भारतीय ज्ञान परंपरा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर चर्चा

कार्यक्रम की अध्यक्षता दिल्ली कौशल एवं उद्यमिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अशोक कुमार नगावत ने की। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा और संतों के दर्शन की समकालीन उपयोगिता पर विचार रखे।

नगावत ने कहा कि संत रविदास सहित भारतीय संत परंपरा के विचार आधुनिक तकनीक को मानवीय दिशा देने में उपयोगी हो सकते हैं। उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के विकास में नैतिक मूल्यों और मानवीय दृष्टिकोण के महत्व पर भी जोर दिया।

उन्होंने बेहतर समाज के निर्माण के लिए संत रविदास के विचारों को अपनाने की आवश्यकता बताई।

ABRSM ने शिक्षा और सामाजिक जिम्मेदारी पर रखी बात

कार्यक्रम में प्रो. गीता भट्ट ने आयोजन की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ की शैक्षणिक और सामाजिक गतिविधियों की जानकारी दी।

उन्होंने संगठन की वर्ष 1988 से चली आ रही यात्रा और शिक्षा तथा शिक्षक समुदाय के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का उल्लेख किया।

कार्यक्रम के आरंभ में महासंघ और संत रविदास के जीवन पर आधारित लघु चलचित्र दिखाए गए। इसके बाद मंचासीन अतिथियों ने पुस्तक का विमोचन किया और विभिन्न वक्ताओं ने अपने विचार साझा किए।

600 से अधिक शिक्षाविदों और विद्यार्थियों की भागीदारी

इस व्याख्यान में 600 से अधिक प्राचार्य, शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी शामिल हुए। कार्यक्रम में शिक्षा, सामाजिक समरसता और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े विषयों पर चर्चा हुई।

समापन से पहले दिल्ली प्रदेश में उच्च शिक्षा के अध्यक्ष प्रो. मनोज कुमार खन्ना ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। इसके बाद राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के साथ कार्यक्रम का औपचारिक समापन हुआ।

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