दिल्ली में BRICS सम्मेलन 2026 को लेकर भारत, रूस और चीन की गतिविधियों पर दुनिया की नजर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात को अहम माना जा रहा है। इस बीच BRICS देशों की ओर से अंतरराष्ट्रीय कारोबार में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिशों ने अमेरिका का ध्यान भी खींचा है।
BRICS में स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ाने की चर्चा के बीच भारतीय रुपया, रूसी रूबल और चीनी युआन की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, डॉलर को चुनौती देने के लिए केवल वैकल्पिक मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए मजबूत वित्तीय व्यवस्था, बड़ा अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वैश्विक स्तर पर भरोसा भी जरूरी होगा।
BRICS 2026 में डॉलर पर निर्भरता का मुद्दा
BRICS देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की कोशिश लंबे समय से चर्चा में है। इसका मकसद अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में अमेरिकी डॉलर की जरूरत को कुछ हद तक कम करना है।
भारत और रूस के बीच रुपये और रूबल में भुगतान को बढ़ावा देने की दिशा में पहले से प्रयास किए जा रहे हैं। इसी तरह चीन के साथ भी स्थानीय मुद्राओं में कारोबार की संभावनाओं पर चर्चा होती रही है।
यदि BRICS देशों के बीच स्थानीय मुद्रा में भुगतान का नेटवर्क मजबूत होता है, तो व्यापार के कुछ हिस्से में डॉलर की जरूरत कम हो सकती है।
डॉलर के मुकाबले रुपया दबाव में
भारतीय रुपया फिलहाल अमेरिकी डॉलर के मुकाबले दबाव में है। शुक्रवार को रुपया डॉलर के मुकाबले करीब 95.79 के स्तर तक पहुंच गया। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और अमेरिका में ऊंची बॉन्ड यील्ड रुपये पर दबाव डालने वाले प्रमुख कारकों में शामिल हैं।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। तेल की कीमत बढ़ने पर भारत का आयात बिल बढ़ता है। इसके साथ ही डॉलर की मांग भी बढ़ सकती है।
ऐसी स्थिति में रुपये पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। विदेशी निवेश, व्यापार घाटा, ब्याज दर और वैश्विक बाजार का माहौल भी रुपये की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
रुपया, रूबल और युआन की स्थिति
वर्तमान विनिमय दरों के आधार पर भारतीय रुपये की तुलना रूसी रूबल और चीनी युआन से अलग तस्वीर सामने आती है। दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, ₹1 करीब 0.88 रूसी रूबल के बराबर है। इसी तरह ₹1 करीब 0.070 चीनी युआन के बराबर बताया गया है।
इस हिसाब से ₹100 लगभग 88 रूबल और करीब 7 युआन के बराबर होते हैं।
हालांकि, किसी मुद्रा की ताकत केवल उसकी यूनिट वैल्यू देखकर तय नहीं की जा सकती। किसी करेंसी का मूल्यांकन करने के लिए अर्थव्यवस्था का आकार, महंगाई, ब्याज दर, विदेशी मुद्रा भंडार, व्यापार और अंतरराष्ट्रीय मांग जैसे कई पहलुओं को देखना पड़ता है।
रूस के साथ रुपये-रूबल में कारोबार पर जोर
भारत और रूस के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की कोशिश जारी है। रूस के Sberbank India के CEO इवान नोसॉव के मुताबिक, दोनों देशों के बीच नेशनल करेंसी में भुगतान के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जा चुका है।
पहले बैंकिंग, बीमा और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी कई चुनौतियां थीं। अब इनमें सुधार होने से रुपये और रूबल में कारोबार की संभावनाएं बढ़ी हैं।
भारत के लिए इसका एक फायदा यह हो सकता है कि रूस के साथ कुछ व्यापारिक लेनदेन में सीधे डॉलर की जरूरत कम हो।
चीन के साथ युआन की बढ़ती भूमिका
चीन के साथ भारत का व्यापार काफी बड़ा है। ऐसे में रुपये और युआन में सीधे भुगतान की संभावनाएं भी चर्चा का विषय हैं।
फिलहाल भारत-चीन व्यापार में डॉलर समेत दूसरी मुद्राओं की भूमिका बनी हुई है। स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ने पर दोनों देशों के कुछ लेनदेन में डॉलर पर निर्भरता कम की जा सकती है।
हालांकि, रुपये-युआन व्यापार को बढ़ाने के लिए भुगतान व्यवस्था, मुद्रा विनिमय और व्यापार संतुलन जैसी चुनौतियों का समाधान भी जरूरी होगा।
महंगा तेल बढ़ा सकता है रुपये का दबाव
भारत के लिए कच्चे तेल की कीमत रुपये के लिए अहम कारक है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, तो भारत को तेल खरीदने के लिए ज्यादा विदेशी मुद्रा की जरूरत पड़ती है।
इससे डॉलर की मांग बढ़ सकती है और रुपये पर दबाव आ सकता है। इसके अलावा अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी भी निवेशकों को डॉलर आधारित परिसंपत्तियों की ओर आकर्षित कर सकती है।
ऐसे माहौल में भारतीय रिजर्व बैंक की बाजार में भूमिका रुपये की अस्थिरता को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण रहती है।
क्या BRICS डॉलर को तुरंत चुनौती दे सकता है?
स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ने से डॉलर की भूमिका कुछ क्षेत्रों में कम हो सकती है, लेकिन इससे वैश्विक स्तर पर डॉलर का दबदबा तुरंत खत्म होने की संभावना नहीं है।
अमेरिकी डॉलर अभी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार, वित्तीय बाजार और विदेशी मुद्रा भंडार में प्रमुख भूमिका निभाता है। इसलिए BRICS के सामने चुनौती केवल नई भुगतान व्यवस्था बनाने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था तैयार करने की है जिस पर लंबे समय तक वैश्विक कारोबार का भरोसा कायम रहे।
BRICS 2026 में स्थानीय मुद्राओं को लेकर होने वाली चर्चा इसी व्यापक बदलाव का हिस्सा मानी जा रही है। भारत के लिए रुपये का अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल बढ़ाना, रूस के साथ रुपये-रूबल कारोबार और चीन के साथ भुगतान व्यवस्था में बदलाव आने वाले समय में अहम आर्थिक मुद्दे बने रह सकते हैं।
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