नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है। अब तक 300 से ज्यादा लोगों की मौत की पुष्टि और 1,500 से अधिक लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई है। करीब 5,000 बचावकर्मी राहत और रेस्क्यू अभियान में जुटे हैं। इस आपदा ने नेपाल के साथ-साथ भारत के उन मैदानी इलाकों की चिंता भी बढ़ा दी है, जहां हिमालय से निकलने वाली नदियां पहुंचती हैं।
खास तौर पर बिहार में बाढ़ का खतरा नेपाल में होने वाली भारी बारिश और पहाड़ी क्षेत्रों में अचानक बढ़ने वाले जलस्तर से जुड़ा है। इसकी वजह यह है कि बिहार की कई प्रमुख नदियों का बड़ा कैचमेंट क्षेत्र नेपाल और तिब्बत में स्थित है।
नेपाल में बार-बार क्यों आती है बाढ़?
नेपाल का भौगोलिक स्वरूप बाढ़ की स्थिति को गंभीर बनाने वाला है। देश में 6,000 से ज्यादा छोटी-बड़ी नदियां हैं। इनमें कोसी, गंडकी और कर्णाली जैसी प्रमुख नदियां हिमालय से निकलती हैं और दक्षिण की ओर बहती हैं।
मानसून के दौरान नेपाल में होने वाली बारिश का बड़ा हिस्सा कुछ ही महीनों में गिरता है। पहाड़ी इलाकों में ढलान अधिक होने के कारण बारिश का पानी तेजी से नीचे की ओर बहता है। इससे कई क्षेत्रों में अचानक फ्लैश फ्लड की स्थिति पैदा हो सकती है।
ग्लेशियर और GLOF का बढ़ता खतरा
हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने और ग्लेशियल झीलों के विस्तार से भी अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ता है। ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF की स्थिति में ग्लेशियल झील का पानी अचानक नीचे की ओर बह सकता है।
भारी बारिश, भूस्खलन और नदी के रास्ते में मलबा जमा होने से भी जलप्रवाह प्रभावित होता है। ऐसे मामलों में अचानक पानी का दबाव बढ़ने पर नीचे के इलाकों में बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है।
बिहार से नेपाल की बाढ़ का क्या कनेक्शन है?
बिहार की बाढ़ को समझने के लिए वहां की नदियों के कैचमेंट को समझना जरूरी है। बिहार की कई प्रमुख नदियों का जलग्रहण क्षेत्र राज्य की सीमा से बाहर है।
बिहार सरकार के फ्लड मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम के मुताबिक, नेपाल से जुड़ी प्रमुख नदियों में कोसी, गंडक, बागमती, कमला-बलान, महानंदा और अधवारा समूह शामिल हैं।
इन नदियों के कैचमेंट का बड़ा हिस्सा नेपाल और तिब्बत में है। ऐसे में पहाड़ों पर हुई तेज बारिश का प्रभाव नदी के जलस्तर के रूप में बिहार के मैदानी इलाकों तक पहुंच सकता है।
इस बार की बाढ़ में कौन-सा नदी तंत्र अहम है?
इस आपदा के संदर्भ में भोटे कोशी-त्रिशूली नदी तंत्र महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भोटे कोशी से आने वाला पानी त्रिशूली नदी में पहुंचता है। इसके बाद नदी तंत्र का संबंध नारायणी से जुड़ता है, जिसे भारत में गंडक नदी के नाम से जाना जाता है।
लैंडस्लाइड डैम से बढ़ सकता है खतरा
भूस्खलन के कारण यदि नदी का प्रवाह मलबे से अस्थायी रूप से रुक जाता है, तो वहां पानी जमा हो सकता है। इसे लैंडस्लाइड डैम की स्थिति कहा जाता है।
यदि ऐसा प्राकृतिक बांध अचानक टूटता है तो नीचे की ओर तेज पानी की दूसरी लहर पहुंच सकती है। इसलिए ऐसे इलाकों में नदी के जलस्तर और भूस्खलन की लगातार निगरानी महत्वपूर्ण हो जाती है।
पहाड़ से मैदान तक आते-आते क्यों बढ़ती है मुश्किल?
हिमालय से निकलने वाली नदियां अपने साथ बड़ी मात्रा में रेत, मिट्टी, गाद और पत्थर लेकर आती हैं। पहाड़ी क्षेत्र में नदी की गति अधिक होती है, लेकिन मैदानी इलाकों में ढाल कम होने के कारण पानी की रफ्तार घट जाती है।
इसके साथ ही नदी द्वारा लाई गई गाद तल में जमा होने लगती है। इससे नदी की जलधारण क्षमता प्रभावित होती है। कई परिस्थितियों में नदी का प्रवाह बदल सकता है और आसपास के क्षेत्रों में पानी फैलने का खतरा बढ़ सकता है।
बिहार में बाढ़ का खतरा इतना ज्यादा क्यों?
बिहार का बड़ा हिस्सा समतल मैदानी क्षेत्र में है। हिमालय से उतरने के बाद नदियों की ढाल कम हो जाती है। इससे पानी के तेजी से निकलने की क्षमता प्रभावित होती है।
बिहार सरकार के आंकड़ों के अनुसार, राज्य का करीब 73 प्रतिशत क्षेत्र बाढ़ प्रभावित या बाढ़ के खतरे वाला माना जाता है। राज्य के 38 में से 28 जिले बाढ़ के जोखिम वाले क्षेत्रों में आते हैं।
उत्तर बिहार में बाढ़ की समस्या विशेष रूप से गंभीर है, क्योंकि यहां कई प्रमुख नदियां नेपाल से होकर या नेपाल के जलग्रहण क्षेत्रों से पानी लेकर आती हैं।
कोसी और गंडक से लेकर बागमती तक कई नदियां जुड़ी
गंडक: नेपाल में इसे नारायणी नदी के नाम से जाना जाता है। भारत में प्रवेश करने के बाद यह बिहार से होकर गुजरती है और गंगा में मिलती है।
कोसी: इसका ऊपरी कैचमेंट नेपाल और तिब्बत में है। बिहार में यह लंबे क्षेत्र से होकर गुजरती है और अंततः गंगा में मिलती है।
बागमती: नेपाल से निकलकर बिहार में प्रवेश करने वाली यह नदी मानसून के दौरान जलस्तर बढ़ने के कारण बाढ़ का बड़ा कारण बन सकती है।
कमला-बलान और महानंदा: इन नदियों का भी बिहार के कई जिलों में बाढ़ के लिहाज से महत्वपूर्ण प्रभाव है।
सिर्फ तटबंधों से नहीं रुकेगी बाढ़
बिहार में बाढ़ से बचाव के लिए हजारों किलोमीटर लंबे तटबंध बनाए गए हैं। राज्य में करीब 3,746 किलोमीटर तटबंध होने के बावजूद पूरे नदी तंत्र को केवल तटबंधों के जरिए नियंत्रित करना चुनौतीपूर्ण है।
इसकी बड़ी वजह यह है कि नदी में आने वाला पानी कई बार भारत की सीमा में पहुंचने से पहले ही नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों में जमा हो चुका होता है। इसलिए बाढ़ प्रबंधन में भारत और नेपाल के बीच जलस्तर की निगरानी, बाढ़ पूर्वानुमान और अर्ली वॉर्निंग सिस्टम की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
भारत-नेपाल सहयोग क्यों जरूरी?
नेपाल में भारी बारिश और पहाड़ी क्षेत्रों में अचानक आने वाले जलप्रवाह की जानकारी समय रहते मिलने पर बिहार के संवेदनशील जिलों में प्रशासन को अलर्ट किया जा सकता है। इससे लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने और राहत-बचाव की तैयारी के लिए अतिरिक्त समय मिल सकता है।
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