थाईलैंड लैंड ब्रिज प्रोजेक्टथाईलैंड लैंड ब्रिज प्रोजेक्ट

थाईलैंड सरकार ने अपने महत्वाकांक्षी 30 अरब डॉलर के ‘लैंड ब्रिज’ प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी है। यह परियोजना दक्षिण-पूर्व एशिया के समुद्री व्यापार मार्गों में बड़ा बदलाव ला सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस परियोजना से न केवल क्षेत्रीय व्यापार को गति मिलेगी, बल्कि भारत के ग्रेट निकोबार ट्रांसशिपमेंट पोर्ट प्रोजेक्ट को भी लाभ मिल सकता है।

यह परियोजना ऐसे समय में आगे बढ़ रही है जब भारत और थाईलैंड के बीच आर्थिक एवं रणनीतिक सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है।

क्या है थाईलैंड का लैंड ब्रिज प्रोजेक्ट?

वर्तमान में पूर्वी एशिया, चीन, जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया से मध्य पूर्व तथा यूरोप जाने वाले अधिकांश जहाज मलक्का जलडमरूमध्य (Malacca Strait) से होकर गुजरते हैं। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे व्यस्त व्यापारिक मार्गों में से एक माना जाता है।

मलक्का जलडमरूमध्य में भारी समुद्री यातायात और सीमित चौड़ाई के कारण जहाजों को अक्सर देरी का सामना करना पड़ता है। इससे परिवहन लागत और समय दोनों बढ़ जाते हैं।

इसी चुनौती को देखते हुए थाईलैंड सरकार ने लैंड ब्रिज प्रोजेक्ट तैयार किया है।

परियोजना के तहत:

  • थाईलैंड के पूर्वी तट पर चुमपोन (Chumphon) पोर्ट विकसित किया जाएगा।
  • पश्चिमी तट पर रानोंग (Ranong) पोर्ट का निर्माण होगा।
  • दोनों बंदरगाहों को लगभग 90 किलोमीटर लंबे लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर से जोड़ा जाएगा।
  • इस कॉरिडोर में हाई-स्पीड रेल नेटवर्क, मल्टी-लेन हाईवे और पाइपलाइन प्रणाली शामिल होगी।

इस व्यवस्था के तहत एक समुद्री तट पर पहुंचा माल ट्रेनों और ट्रकों के जरिए दूसरे तट तक पहुंचाया जाएगा, जहां उसे दूसरे जहाजों में लोड कर आगे भेजा जाएगा।

माल ढुलाई में समय और लागत कम होने की उम्मीद

थाईलैंड सरकार के अनुसार, इस परियोजना के संचालन से माल ढुलाई की लागत में लगभग 30 प्रतिशत तक कमी आ सकती है।

सरकारी अनुमानों के मुताबिक, एशिया और मध्य पूर्व के बीच व्यापारिक परिवहन का समय भी काफी कम हो सकता है। इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को नई गति मिलने की संभावना है।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को कैसे मिल सकता है लाभ?

भारत सरकार अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में ग्रेट निकोबार इंटरनेशनल ट्रांसशिपमेंट पोर्ट विकसित कर रही है। यह परियोजना हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की समुद्री क्षमताओं को मजबूत करने के उद्देश्य से शुरू की गई है।

विशेषज्ञों के अनुसार, थाईलैंड का पश्चिमी तट स्थित रानोंग पोर्ट अंडमान सागर की ओर खुलता है। यह क्षेत्र भारत के ग्रेट निकोबार द्वीप के अपेक्षाकृत निकट माना जाता है।

ऐसी स्थिति में दोनों परियोजनाएं भविष्य में क्षेत्रीय समुद्री व्यापार नेटवर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती हैं।

अंडमान और निकोबार प्रशासन के अधिकारियों ने भी पहले इस बात पर जोर दिया है कि क्षेत्र में विकसित होने वाले नए समुद्री मार्ग द्वीप समूह के रणनीतिक महत्व को बढ़ा सकते हैं।

भारत और थाईलैंड के बीच बढ़ सकता है समुद्री व्यापार

थाईलैंड का लैंड ब्रिज प्रोजेक्ट भारत और थाईलैंड के बीच समुद्री संपर्क को भी मजबूत कर सकता है।

रानोंग पोर्ट के विकसित होने के बाद दक्षिण-पूर्व एशिया से आने वाला माल भारत के पूर्वी तट के प्रमुख बंदरगाहों तक अधिक तेजी से पहुंच सकता है।

कोलकाता, चेन्नई और विशाखापट्टनम जैसे बंदरगाहों को इससे संभावित लाभ मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

भारत और थाईलैंड दोनों बिम्सटेक (BIMSTEC) समूह के सदस्य हैं। ऐसे में क्षेत्रीय संपर्क और व्यापारिक सहयोग बढ़ाने की दिशा में यह परियोजना महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण परियोजना

रक्षा और सामरिक मामलों के कई विशेषज्ञ इस परियोजना को केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मानते हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि यदि इस परियोजना में क्षेत्रीय देशों की भागीदारी बढ़ती है, तो हिंद महासागर क्षेत्र में नए आर्थिक और सामरिक अवसर पैदा हो सकते हैं।

हालांकि परियोजना के विभिन्न चरणों, निवेश संरचना और अंतरराष्ट्रीय भागीदारी को लेकर अंतिम निर्णय अभी आने बाकी हैं।

आगे क्या?

थाईलैंड सरकार द्वारा मंजूरी मिलने के बाद अब परियोजना के कार्यान्वयन की प्रक्रिया पर नजर रहेगी। वहीं भारत का ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भी विकास के चरण में है।

दोनों परियोजनाओं की प्रगति आने वाले वर्षों में हिंद महासागर और दक्षिण-पूर्व एशिया के समुद्री व्यापार पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती है।

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