भारतीय मुक्केबाज अरुंधति चौधरी ने कॉमनवेल्थ गेम्स में शानदार प्रदर्शन करते हुए महिलाओं के 70 किलोग्राम वर्ग में स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया। फाइनल मुकाबले में उन्होंने इंग्लैंड की शैंटली रीड को एकतरफा अंदाज में हराकर भारत को गोल्ड दिलाया। इस जीत के साथ अरुंधति ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी मजबूत दावेदारी पेश की और भारतीय महिला मुक्केबाजी को नई पहचान दिलाई।
कॉमनवेल्थ गेम्स में अरुंधति चौधरी का प्रदर्शन पूरे टूर्नामेंट के दौरान प्रभावशाली रहा। उन्होंने क्वार्टर फाइनल से लेकर फाइनल तक लगातार दमदार मुकाबले जीतकर गोल्ड मेडल पर कब्जा जमाया।
कॉमनवेल्थ गेम्स में अरुंधति चौधरी का शानदार प्रदर्शन
अरुंधति चौधरी ने प्रतियोगिता के क्वार्टर फाइनल में न्यूजीलैंड की मॉर्गन हेंडरसन को हराया। इसके बाद सेमीफाइनल में वेल्स की रोज़ी एकल्स को मात दी, जो पिछली कॉमनवेल्थ चैंपियन रह चुकी थीं।
फाइनल मुकाबले में इंग्लैंड की शैंटली रीड के खिलाफ भी भारतीय मुक्केबाज ने आत्मविश्वास से भरा प्रदर्शन किया। पूरे मुकाबले में उन्होंने आक्रामक रणनीति अपनाई और निर्णायकों को प्रभावित करते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम किया।
अरुंधति चौधरी का सफर: कोटा से अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाजी तक
राजस्थान की बेटी ने बनाया अलग मुकाम
अरुंधति चौधरी का जन्म राजस्थान के कोटा में हुआ। उनके पिता सुरेश चौधरी प्रॉपर्टी व्यवसाय से जुड़े हैं और चाहते थे कि उनकी बेटी इंजीनियरिंग की पढ़ाई करे।
हालांकि, अरुंधति ने खेलों में करियर बनाने का फैसला किया। शुरुआती दिनों में वह बास्केटबॉल खेलती थीं और अपनी टीम की कप्तान भी रहीं। 15 वर्ष की उम्र में उन्होंने बॉक्सिंग को अपना करियर चुना।
कोच अशोक गौतम के मार्गदर्शन में उन्होंने लगातार मेहनत की और राष्ट्रीय स्तर से अंतरराष्ट्रीय मंच तक अपनी पहचान बनाई।
गंभीर चोटों के बाद भी नहीं मानी हार
मुश्किल दौर से मजबूत वापसी
अरुंधति चौधरी का खेल जीवन आसान नहीं रहा। करियर के दौरान उन्हें कई गंभीर चोटों का सामना करना पड़ा।
कलाई में फ्रैक्चर होने के बाद सर्जरी कर प्लेट लगानी पड़ी। इसके अलावा एंकल और सिर की चोटों के कारण वह लगभग दो वर्ष तक प्रतियोगिताओं से बाहर रहीं।
लंबे समय तक रिकवरी के बाद उन्होंने शानदार वापसी की और लगातार राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीतना शुरू किया। यही संघर्ष आज उनकी सबसे बड़ी ताकत माना जाता है।
भारतीय सेना में हवलदार हैं अरुंधति चौधरी
खेल के साथ-साथ अरुंधति चौधरी भारतीय सेना में हवलदार के पद पर भी कार्यरत हैं।
सेना में रहते हुए उन्होंने खेल और अनुशासन के बीच संतुलन बनाया तथा अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उनकी सफलता युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा मानी जा रही है।
लॉस एंजेलिस ओलंपिक पर नजर
कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीतने के बाद अरुंधति चौधरी का अगला लक्ष्य ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतना है।
उनका कहना रहा है कि वह लॉस एंजेलिस ओलंपिक की तैयारी पर पूरा ध्यान केंद्रित कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा प्रदर्शन को देखते हुए वह भविष्य में भारत के लिए बड़ी उम्मीद बन सकती हैं।
भारत की महिला मुक्केबाजों ने जीते कई स्वर्ण पदक
कॉमनवेल्थ गेम्स में भारतीय महिला मुक्केबाजों ने शानदार प्रदर्शन किया।
- अरुंधति चौधरी — 70 किग्रा वर्ग (स्वर्ण)
- साक्षी चौधरी — 51 किग्रा वर्ग (स्वर्ण)
- प्रीति पवार — 54 किग्रा वर्ग (स्वर्ण)
- जैस्मिन लैंबोरिया — 57 किग्रा वर्ग (स्वर्ण)
- प्रिया घनघस — 60 किग्रा वर्ग (स्वर्ण)
इन सफलताओं ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय महिला मुक्केबाजी की मजबूती को फिर साबित किया है।
भारतीय मुक्केबाजी के लिए बड़ी उपलब्धि
कॉमनवेल्थ गेम्स में अरुंधति चौधरी सहित भारतीय महिला खिलाड़ियों के शानदार प्रदर्शन ने देश के खेल जगत को नई ऊर्जा दी है। लगातार मिल रहे स्वर्ण पदक इस बात का संकेत हैं कि भारतीय मुक्केबाजी विश्व स्तर पर लगातार मजबूत हो रही है।
आगामी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं और ओलंपिक को देखते हुए भारतीय टीम से पदकों की उम्मीद और बढ़ गई है।
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