मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद में इंदौर हाई कोर्ट की खंडपीठ ने शुक्रवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की वैज्ञानिक सर्वे रिपोर्ट और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर परिसर के धार्मिक स्वरूप को मां वाग्देवी सरस्वती मंदिर माना। कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष की नमाज संबंधी मांग और जैन समाज की याचिकाओं को खारिज कर दिया। साथ ही कहा कि यदि मुस्लिम पक्ष चाहे तो राज्य सरकार से वैकल्पिक भूमि आवंटन की मांग कर सकता है।
यह फैसला लंबे समय से चले आ रहे भोजशाला विवाद में बड़ा मोड़ माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह स्थल एक संरक्षित पुरातात्विक स्मारक है और इसका संरक्षण Ancient Monuments and Archaeological Sites and Remains Act, 1958 के तहत जारी रहेगा।
क्या है भोजशाला विवाद?
धार स्थित भोजशाला को हिंदू पक्ष प्राचीन मां वाग्देवी यानी सरस्वती मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र मानता रहा है। मान्यता है कि 11वीं शताब्दी में परमार वंश के राजा भोज ने यहां विद्या और संस्कृति का प्रमुख केंद्र स्थापित किया था। दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष इस स्थल को कमाल मौला मस्जिद बताता रहा है और वहां नमाज का अधिकार मांगता रहा।
विवाद का मुख्य मुद्दा यही रहा कि वर्तमान ढांचे का मूल स्वरूप मंदिर है या मस्जिद। वर्षों से यह मामला आस्था, इतिहास, पुरातत्व और कानून के बीच संघर्ष का विषय बना हुआ था।
राजा भोज से जुड़ा है भोजशाला का इतिहास
इतिहासकारों के अनुसार भोजशाला का संबंध परमार वंश के राजा भोज से माना जाता है। राजा भोज को शिक्षा, साहित्य और संस्कृति का संरक्षक शासक माना जाता है। हिंदू संगठनों का दावा है कि यहां मां सरस्वती की प्रतिमा स्थापित थी और यह संस्कृत अध्ययन का बड़ा केंद्र था।
हिंदू पक्ष का आरोप है कि 1305 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के दौरान मंदिर को नुकसान पहुंचाया गया और उसके अवशेषों से मस्जिदनुमा ढांचा तैयार किया गया। वहीं मुस्लिम पक्ष का कहना रहा कि यह स्थल लंबे समय से मस्जिद के रूप में उपयोग में रहा है और वहां नमाज अदा की जाती रही है।
ऐतिहासिक दस्तावेजों में क्या मिले संकेत?
ब्रिटिशकालीन गजेटियर, पुरातात्विक रिकॉर्ड और कई शोध पत्रों में भोजशाला को सरस्वती मंदिर और शिक्षा केंद्र के रूप में उल्लेखित किया गया है। जर्मन भारतविद एलॉइस एंटोन फ्यूहरर ने 1893 में पहली बार “भोजशाला” शब्द का प्रयोग किया था। बाद में ब्रिटिश अधिकारी के.के. लेले ने यहां मिले संस्कृत शिलालेखों का अध्ययन कराया।
हिंदू पक्ष ने अदालत में दावा किया कि परिसर के स्थापत्य तत्व, देवी सरस्वती से जुड़े प्रतीक और संस्कृत शिलालेख मंदिर स्वरूप की पुष्टि करते हैं। अदालत के सामने ब्रिटिशकालीन दस्तावेज और पुरातात्विक रिकॉर्ड भी प्रस्तुत किए गए।
ASI सर्वे ने क्या पाया?
मामले में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब हाई कोर्ट ने 11 मार्च 2024 को ASI को वैज्ञानिक सर्वेक्षण का आदेश दिया। ASI ने 22 मार्च 2024 से करीब 98 दिनों तक परिसर का अध्ययन किया और 15 जुलाई 2024 को 2100 पन्नों की रिपोर्ट अदालत में सौंपी।
रिपोर्ट में कहा गया कि मौजूदा ढांचे से पहले वहां परमारकालीन विशाल संरचना मौजूद थी। ASI को परिसर में लाल पत्थरों के नक्काशीदार स्तंभ, संस्कृत और प्राकृत भाषा के शिलालेख, सभा कक्ष, यज्ञ कुंड और देवी-देवताओं से जुड़े प्रतीक मिले।
रिपोर्ट के अनुसार कई स्तंभों और दीवारों पर मानव और पशु आकृतियों को जानबूझकर क्षतिग्रस्त किया गया था। ASI ने यह भी कहा कि वर्तमान ढांचे में मंदिर के अवशेषों का उपयोग किया गया है।
सर्वे के दौरान संस्कृत वर्णमाला, व्याकरण संबंधी शिलालेख और “कर्पूरमंजरी” नाटक के अंश भी मिले। रिपोर्ट में परमार वंश के राजा नरवर्मन का उल्लेख भी सामने आया। ASI ने परिसर को साहित्यिक और शैक्षणिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र बताया।
कोर्ट में किन पक्षों ने रखे तर्क?
इंदौर हाई कोर्ट की डबल बेंच में इस मामले की नियमित सुनवाई 6 अप्रैल 2026 से शुरू हुई। 12 मई तक चली सुनवाई में हिंदू, मुस्लिम और जैन पक्षों ने अपने-अपने दावे अदालत के सामने रखे।
हिंदू पक्ष की ओर से अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन, विनय जोशी और याचिकाकर्ता आशीष गोयल ने दलील दी कि परिसर के स्थापत्य और शिलालेख मंदिर होने की पुष्टि करते हैं। उन्होंने कहा कि यहां वर्षों से वसंत पंचमी पर पूजा होती रही है।
दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष ने इसे कमाल मौला मस्जिद बताते हुए नमाज की परंपरा का हवाला दिया। मुस्लिम पक्ष का कहना था कि सदियों से यह स्थल मस्जिद के रूप में उपयोग में रहा है। जैन समाज ने भी इस स्थल को अपने इतिहास से जुड़ा बताते हुए दावा पेश किया, लेकिन अदालत ने उनकी याचिकाएं भी खारिज कर दीं।
हाई कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?
15 मई 2026 को आए फैसले में अदालत ने ASI रिपोर्ट और ऐतिहासिक साक्ष्यों पर भरोसा जताते हुए कहा कि भोजशाला का धार्मिक चरित्र मां वाग्देवी सरस्वती मंदिर का है।
कोर्ट ने कहा कि यह स्थल संरक्षित पुरातात्विक स्मारक है और यहां मुस्लिम पक्ष को नमाज का अधिकार नहीं दिया जा सकता। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि मुस्लिम समुदाय चाहे तो वह राज्य सरकार से वैकल्पिक भूमि आवंटन की मांग कर सकता है।
अदालत ने लंदन के संग्रहालय में रखी मां वाग्देवी की प्रतिमा पर भी टिप्पणी की और कहा कि उसे भारत वापस लाने का विषय केंद्र सरकार के विचाराधीन है।
1951 से संरक्षित स्मारक है भोजशाला
भोजशाला को 1951 में संरक्षित स्मारक घोषित किया गया था। इसके बाद 1952 में हिंदू समाज ने यहां “भोज दिवस” मनाना शुरू किया। जवाब में 1953 से मुस्लिम समुदाय ने उर्स आयोजन शुरू किया।
बाद में प्रशासन ने व्यवस्था बनाई कि मंगलवार को हिंदू पूजा करेंगे और शुक्रवार को दोपहर 1 से 3 बजे तक मुस्लिम समुदाय नमाज अदा करेगा। कई वर्षों तक यही व्यवस्था लागू रही।
अयोध्या आंदोलन के बाद भोजशाला विवाद ने राजनीतिक रूप भी लिया। विश्व हिंदू परिषद और अन्य संगठनों ने यहां पूर्ण पूजा अधिकार की मांग तेज कर दी। 2003 में वसंत पंचमी के दौरान बड़ा विवाद और हिंसा भी हुई थी।
मध्य प्रदेश सरकार ने क्या कहा?
मध्य प्रदेश सरकार की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने अदालत में पक्ष रखा। फैसले के बाद सरकार ने कहा कि इसे किसी की जीत या हार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
सरकार के अनुसार धार में लंबे समय से कानून-व्यवस्था बनाए रखना चुनौती बना हुआ था। कई बार तनावपूर्ण हालात और हिंसा की घटनाएं सामने आई थीं। सरकार ने उम्मीद जताई कि इस फैसले से प्रदेश में शांति और सामाजिक समरसता मजबूत होगी।
अब सुप्रीम कोर्ट पर टिकी नजर
अब सभी की नजर इस बात पर है कि मुस्लिम पक्ष हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम Court में चुनौती देता है या नहीं। वहीं हिंदू संगठनों ने भोजशाला में नियमित पूजा और मां वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित करने की मांग तेज कर दी है।
करीब सात दशकों से विवादों, अदालतों और राजनीतिक बहस का केंद्र रही भोजशाला पर हाई कोर्ट का यह फैसला एक महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ माना जा रहा है। हालांकि अंतिम स्थिति सुप्रीम कोर्ट की संभावित सुनवाई के बाद ही स्पष्ट होगी।
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