संसद का विशेष सत्र 16 से 18 अप्रैल तक आयोजित होने जा रहा है, जिसमें केंद्र सरकार तीन अहम विधेयक पेश करेगी। इन विधेयकों के जरिए ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को 2029 के लोकसभा चुनाव से लागू करने की तैयारी है। हालांकि, इस पहल के साथ ही परिसीमन (Delimitation) और सीटों के नए संतुलन को लेकर सियासत गरमा गई है।
तीन दिन का यह सत्र भले ही छोटा हो, लेकिन इसके दूरगामी राजनीतिक प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। सरकार जहां इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रही है, वहीं विपक्ष और कई राज्य इसे राजनीतिक संतुलन बदलने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।
3 बड़े बिलों के जरिए आगे बढ़ेगा मिशन
सरकार इस विशेष सत्र में तीन प्रमुख बिल पेश करेगी:
- संविधान संशोधन विधेयक
- परिसीमन (Delimitation) विधेयक 2026
- यूनियन टेरिटरी लॉज (संशोधन) विधेयक
इन विधेयकों का उद्देश्य महिला आरक्षण को जल्द लागू करना और निर्वाचन क्षेत्रों के नए सिरे से निर्धारण का रास्ता साफ करना है। मौजूदा नियमों के तहत यह प्रक्रिया 2027 की जनगणना और उसके बाद के परिसीमन पर निर्भर थी, लेकिन सरकार अब इस इंतजार को खत्म करना चाहती है।
2029 से लागू हो सकता है 33% महिला आरक्षण
सरकार की योजना है कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण 2029 से लागू किया जाए। इसके तहत:
- लोकसभा में महिलाओं के लिए करीब 273 सीटें आरक्षित हो सकती हैं
- SC/ST महिलाओं को भी इसी आरक्षण में हिस्सा मिलेगा
- आरक्षण की अवधि 15 वर्ष होगी
- सीटों का रोटेशन किया जाएगा
इससे देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने की उम्मीद है।
लोकसभा की सीटें 850 तक बढ़ाने का प्रस्ताव
विधेयक में लोकसभा की वर्तमान 543 सीटों को बढ़ाकर लगभग 850 तक करने का प्रस्ताव है। इसका मकसद बढ़ती आबादी के अनुरूप प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है। लेकिन यही प्रस्ताव अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सीटों के इस पुनर्वितरण से संसद का पूरा नक्शा बदल सकता है और राजनीतिक समीकरण भी नए सिरे से बन सकते हैं।
2011 जनगणना पर आधारित होगा परिसीमन?
सबसे बड़ा विवाद परिसीमन के आधार को लेकर है। सरकार 2027 की बजाय 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन की तैयारी कर रही है, ताकि महिला आरक्षण को 2029 तक लागू किया जा सके।
लेकिन दक्षिण भारत के कई राज्य—तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और तेलंगाना—इसका विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है और अब उन्हें कम सीटों के जरिए नुकसान उठाना पड़ सकता है।
संसद में नंबर गेम भी अहम
इस विधेयक को पास कराने के लिए सरकार को संसद में विशेष बहुमत की जरूरत होगी। लोकसभा में NDA के पास करीब 292-293 सांसद हैं, जबकि संविधान संशोधन के लिए लगभग 362 वोटों की जरूरत होगी।
राज्यसभा में भी स्थिति आसान नहीं है, जहां NDA के पास लगभग 141 सीटें हैं और बहुमत के लिए 164 का आंकड़ा चाहिए। ऐसे में सरकार को अन्य दलों का समर्थन हासिल करना होगा।
विपक्ष का समर्थन, लेकिन शर्तों के साथ
विपक्ष ने महिला आरक्षण का समर्थन किया है, लेकिन परिसीमन के मुद्दे पर गंभीर आपत्तियां जताई हैं। कांग्रेस समेत कई दलों का कहना है कि महिला आरक्षण के नाम पर राजनीतिक नक्शा बदलने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।
दक्षिणी राज्यों ने सर्वदलीय बैठक की मांग भी की है और चेतावनी दी है कि बिना सहमति के आगे बढ़ने पर विरोध होगा।
सरकार का पक्ष: ऐतिहासिक मौका
सरकार का कहना है कि यह विधेयक देश की आधी आबादी को उनका अधिकार देने का ऐतिहासिक अवसर है। साथ ही यह भी दावा किया जा रहा है कि किसी भी राज्य के साथ अन्याय नहीं होगा और संतुलन बनाए रखा जाएगा।
अब नजरें संसद पर
इस मुद्दे पर 16 और 17 अप्रैल को लोकसभा में तथा 18 अप्रैल को राज्यसभा में चर्चा होगी। करीब 25 से 28 घंटे की बहस के दौरान यह तय होगा कि महिला आरक्षण का भविष्य क्या होगा और परिसीमन का नया स्वरूप कैसा होगा।
फिलहाल, यह साफ है कि यह सत्र सिर्फ एक विधेयक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की राजनीति, सत्ता संतुलन और लोकतांत्रिक ढांचे को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है।
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