जम्मू-कश्मीर में शराब की दुकानों को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। प्रदेश के कई हिस्सों में धार्मिक संगठनों ने शराब के ठेकों के खिलाफ प्रदर्शन किया और धरने दिए।
कठुआ और आरएस पुरा क्षेत्रों में सिख और इस्लामी संगठनों ने विरोध प्रदर्शन की अगुवाई की। वहीं शिवसेना ने भी इस मुद्दे पर अपना विरोध दर्ज कराया है।
सरकार की ओर से सफाई देते हुए नेशनल कॉन्फ्रेंस के आबकारी मंत्री के हवाले से कहा गया है कि नई शराब की दुकानें खोलने की कोई योजना नहीं है। हालांकि, विपक्ष और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि राजस्व बढ़ाने के लिए सरकार नियमों में ढील दे रही है।
लाइसेंस बढ़ने से बढ़ा विवाद
आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024-25 में प्रदेश में 83 नए शराब लाइसेंस जारी किए गए थे। इसके बाद और दुकानों के लाइसेंस दिए जाने की संभावना जताई जा रही थी।
इसी बीच नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायक हसनैन मसूदी के बयान ने विवाद को और हवा दे दी। उन्होंने कहा था कि शराब की बिक्री से राज्य का राजस्व बढ़ता है और प्रतिबंध लगाने से अवैध शराब का कारोबार बढ़ सकता है।
धार्मिक संगठनों की कड़ी प्रतिक्रिया
मुत्तहिदा मजलिस उलेमा (MMU) ने इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई। संगठन ने कहा कि इस्लाम में शराब पूरी तरह वर्जित है और इससे समाज में अपराध व पारिवारिक कलह बढ़ती है।
मीरवाइज-ए-कश्मीर डॉ. मौलवी उमर फारूक ने सरकार से इस फैसले पर पुनर्विचार करने और पूर्ण शराबबंदी लागू करने की मांग की।
अन्य संगठनों का भी समर्थन
इस मुद्दे पर सिख संगठनों और शिवसेना ने भी विरोध दर्ज कराया है। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आशंका जताई कि यदि शराब की दुकानों की संख्या बढ़ाई गई तो भविष्य में अन्य गतिविधियों को भी बढ़ावा मिल सकता है।
प्रदेश में शराब दुकानों की स्थिति
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर में कुल 223 शराब की दुकानें संचालित हो रही हैं। इनमें से 219 दुकानें जम्मू क्षेत्र में हैं, जबकि कश्मीर घाटी में केवल 4 दुकानें हैं, जो श्रीनगर में स्थित हैं।
आर्थिक बनाम सामाजिक बहस
विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद अब आर्थिक और सामाजिक पहलुओं के बीच संतुलन का मुद्दा बन गया है। एक ओर सरकार के लिए शराब से मिलने वाला राजस्व महत्वपूर्ण है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक और धार्मिक संगठन इसे समाज के लिए हानिकारक बता रहे हैं।
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