इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष के स्थायी समाधान को लेकर हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र युवराज कुंडल ने अपने विचार लेख में Two-State Solution यानी दो-राष्ट्र समाधान को सबसे व्यावहारिक विकल्प बताया है। उन्होंने अपने लेख “Beyond Perpetual Conflict: Reassessing the Two-State Framework” में इजराइल और फिलिस्तीन के बीच लंबे समय से जारी संघर्ष, ऐतिहासिक घटनाओं, Hamas की भूमिका, इजराइली सरकार की नीतियों और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता जैसे मुद्दों पर अपनी राय रखी है।
कुंडल ने लेख में कहा है कि संघर्ष को केवल सैन्य टकराव के नजरिए से देखने के बजाय दोनों पक्षों के राजनीतिक अधिकारों और सुरक्षा चिंताओं को ध्यान में रखते हुए समाधान तलाशना जरूरी है।
इजराइल-फिलिस्तीन विवाद के समाधान पर तीन विकल्प
Two-State Solution को बताया व्यावहारिक रास्ता
युवराज कुंडल ने अपने लेख में इजराइल-फिलिस्तीन विवाद के संभावित समाधान के तौर पर तीन विकल्पों का उल्लेख किया है। इनमें Three-State Solution, One-State Solution और Two-State Solution शामिल हैं।
उनके अनुसार, मौजूदा परिस्थितियों में इजराइल और फिलिस्तीन के लिए अलग-अलग दो संप्रभु राष्ट्रों की व्यवस्था सबसे व्यावहारिक विकल्प हो सकती है। उनका तर्क है कि दोनों समुदायों की अलग राष्ट्रीय पहचान और राजनीतिक आकांक्षाओं को स्वीकार करते हुए समाधान तलाशना संघर्ष को समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
कुंडल ने कहा कि दोनों पक्षों को अपने-अपने पड़ोसी के अस्तित्व और अधिकारों को स्वीकार करना होगा। उनके अनुसार, स्थायी शांति के लिए केवल एक पक्ष की सुरक्षा या राजनीतिक मांगों को प्राथमिकता देना पर्याप्त नहीं होगा।
Hamas और नागरिकों की सुरक्षा का मुद्दा
लेख में Hamas के हमलों और नागरिकों के खिलाफ हिंसा को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। युवराज कुंडल ने विशेष रूप से महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के अपहरण तथा नागरिकों को निशाना बनाने की घटनाओं की आलोचना की है।
उन्होंने धार्मिक आधार पर ऐसी हिंसा को उचित ठहराए जाने के खिलाफ सवाल उठाते हुए कहा कि Hamas की आलोचना को फिलिस्तीनी लोगों या अरब समुदाय की आलोचना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
इसी तरह उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इजराइली सरकार की नीतियों या सैन्य कार्रवाई की आलोचना को यहूदी समुदाय या इजराइल के अस्तित्व के अधिकार के विरोध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
सभी पक्षों के लिए समान जवाबदेही पर जोर
कुंडल ने अपने लेख में जवाबदेही को सभी पक्षों पर समान रूप से लागू करने की बात कही है। उनका कहना है कि मानवाधिकारों और नागरिकों की सुरक्षा का मुद्दा किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं होना चाहिए।
उन्होंने महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के सवाल को व्यापक मानवाधिकार के संदर्भ में उठाया है और कहा है कि किसी भी पक्ष की हिंसा को केवल राजनीतिक या धार्मिक पहचान के आधार पर सही नहीं ठहराया जाना चाहिए।
1973 के Yom Kippur War का भी किया उल्लेख
युवराज कुंडल ने अपने लेख में 1973 के Yom Kippur War का उदाहरण देते हुए कहा कि किसी भी युद्ध की व्याख्या अक्सर अलग-अलग पक्ष अपने राजनीतिक और ऐतिहासिक नजरिए से करते हैं।
उन्होंने युद्ध की शुरुआत और उसके परिणाम को लेकर अरब तथा इजराइली पक्षों की अलग-अलग ऐतिहासिक धारणाओं का उल्लेख किया है। कुंडल के अनुसार, संघर्ष के दौरान शुरुआती घटनाओं पर जोर देने से कई बार युद्ध के अंतिम परिणाम और उससे जुड़े जटिल राजनीतिक पहलू चर्चा से बाहर हो जाते हैं।
इसी संदर्भ को उन्होंने मौजूदा इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष से जोड़ते हुए 7 अक्टूबर 2023 के Hamas हमले और उसके बाद हुई घटनाओं का उल्लेख किया है।
9/11 के बाद पश्चिम में इस्लाम को लेकर धारणा पर सवाल
लेख में कुंडल ने 9/11 हमले के बाद पश्चिमी देशों में इस्लाम और मुस्लिम समुदाय को लेकर बनी धारणाओं का भी उल्लेख किया है। उन्होंने कहा कि आतंकवाद, सुरक्षा और प्रवासन से जुड़े मुद्दों ने पश्चिमी समाज में मुस्लिम समुदाय को लेकर बहस को प्रभावित किया है।
हालांकि, उन्होंने इन मुद्दों को इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष से जोड़ते हुए यह भी तर्क दिया है कि किसी संगठन या व्यक्ति की हिंसक कार्रवाई के आधार पर पूरे धार्मिक या जातीय समुदाय को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है।
अमेरिका की मध्यस्थ भूमिका पर उठाया सवाल
Two-State Solution को लागू करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता भी लेख का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। कुंडल ने सवाल उठाया है कि अमेरिका की तुलना में कौन-सा देश इजराइल और फिलिस्तीन के बीच प्रभावी मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है।
उनके अनुसार, अमेरिका के पास दोनों पक्षों पर प्रभाव डालने की क्षमता है। हालांकि, किसी भी मध्यस्थता की सफलता के लिए दोनों पक्षों की राजनीतिक इच्छा और अंतरराष्ट्रीय समर्थन जरूरी होगा।
स्थायी समाधान के लिए दोनों देशों की मान्यता जरूरी
युवराज कुंडल ने अपने लेख में निष्कर्षात्मक राजनीतिक टिप्पणी के बजाय इस विचार पर जोर दिया है कि इजराइल और फिलिस्तीन दोनों के राजनीतिक अस्तित्व और अधिकारों को स्वीकार करना संघर्ष के समाधान की बुनियादी शर्त हो सकती है।
उन्होंने Hamas को संघर्ष के राजनीतिक समाधान की राह में एक प्रमुख चुनौती के रूप में देखा है और साथ ही इजराइली नीतियों की जवाबदेही की जरूरत पर भी जोर दिया है। लेख में उनका मुख्य तर्क यही है कि लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष का समाधान किसी एक पक्ष की जीत में नहीं, बल्कि दोनों पक्षों के लिए राजनीतिक और सुरक्षा व्यवस्था तैयार करने में तलाशा जाना चाहिए।
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