दलबदल विरोधी कानूनदलबदल विरोधी कानून

भारतीय राजनीति में दल-बदल और इस्तीफे का खेल लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। चुनाव जीतने के बाद कई नेता अपनी पार्टी छोड़कर दूसरे दल में शामिल हो जाते हैं। कुछ नेता पहले विधायक या सांसद पद से इस्तीफा देते हैं। इसके बाद वे दूसरी पार्टी के टिकट पर दोबारा चुनाव लड़ते हैं।

ऐसी राजनीति पर रोक लगाने के लिए संविधान में दलबदल विरोधी कानून मौजूद है। इसके बावजूद नेताओं के पार्टी बदलने का सिलसिला जारी है। अब सुप्रीम कोर्ट में इस व्यवस्था को लेकर एक अहम मांग उठी है।

याचिका में मांग की गई है कि अपनी मर्जी से इस्तीफा देकर दूसरी पार्टी में जाने वाले नेताओं पर पांच साल तक चुनाव लड़ने की रोक लगाई जाए। इसके अलावा, उनके इस्तीफे से खाली हुई सीट पर होने वाले उपचुनाव का खर्च भी उन्हीं से वसूला जाए।

सुप्रीम कोर्ट में दलबदल करने वाले नेताओं पर उठे सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर विचार करने की सहमति जताई है। अदालत ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस भी जारी किया है।

यह मामला तमिलनाडु के छह AIADMK विधायकों से जुड़ा है। इन विधायकों ने चुनाव जीतने के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद वे TVK में शामिल हो गए।

पांच साल तक चुनाव लड़ने पर रोक की मांग

याचिकाकर्ता का तर्क है कि चुनाव जीतने के बाद इस्तीफा देकर दूसरी पार्टी में जाना मतदाताओं के जनादेश का अपमान है।

इसलिए ऐसे नेताओं को पांच साल तक चुनाव लड़ने से रोका जाना चाहिए। साथ ही, उनके इस्तीफे के कारण होने वाले उपचुनाव का खर्च भी उनसे वसूला जाना चाहिए।

इन छह विधायकों में से दो इस्तीफे से खाली हुई सीटों पर उपचुनाव लड़कर दोबारा जीत चुके हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अभी इस मांग पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है।

अनंत सिंह का मामला भी चर्चा में क्यों?

बिहार के मोकामा से विधायक अनंत सिंह का मामला भी दल-बदल की राजनीति पर बहस के बीच चर्चा में आया है।

जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने 24 अक्टूबर 2026 को अनंत सिंह और उनकी पत्नी नीलम देवी को छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया था।

जन सुराज उम्मीदवार को समर्थन देने का आरोप

JDU ने आरोप लगाया कि दोनों नेताओं ने पार्टी के निर्देशों का उल्लंघन किया। बिहार विधान परिषद चुनाव में उन्होंने JDU उम्मीदवार के बजाय जन सुराज पार्टी के प्रत्याशी का समर्थन किया।

इसके अलावा, पार्टी ने शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ अनुचित भाषा के इस्तेमाल का आरोप भी लगाया।

पार्टी ने विधानसभा अध्यक्ष से अनंत सिंह की सदस्यता समाप्त करने की सिफारिश करने की बात कही। हालांकि, केवल पार्टी से निष्कासन होने से किसी विधायक की विधानसभा सदस्यता समाप्त नहीं होती।

इसका फैसला संवैधानिक प्रावधानों और संबंधित प्रक्रिया के तहत होता है।

ADR की रिपोर्ट में सामने आए दलबदल के आंकड़े

राजनीति में पार्टी बदलने की प्रवृत्ति को समझने के लिए एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की रिपोर्ट महत्वपूर्ण है।

ADR ने 2014 से 2021 के बीच पार्टी बदलकर दोबारा चुनाव लड़ने वाले सांसदों और विधायकों का विश्लेषण किया था।

कांग्रेस और बीजेपी में कितने नेता गए?

रिपोर्ट के अनुसार, कुल 500 सांसदों और विधायकों के चुनावी हलफनामों का अध्ययन किया गया।

इसमें कई महत्वपूर्ण आंकड़े सामने आए:

  • 177 नेताओं ने कांग्रेस छोड़कर दूसरी पार्टी का दामन थामा।
  • 173 नेता दूसरी पार्टियां छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए।
  • 33 नेताओं ने बीजेपी छोड़कर दूसरी पार्टी का रुख किया।
  • 1,133 पार्टी बदल चुके उम्मीदवारों के हलफनामों का भी अध्ययन किया गया।
  • इन उम्मीदवारों में 253 बीजेपी, 115 कांग्रेस और 65 BSP में शामिल हुए थे।

ये आंकड़े बताते हैं कि भारतीय राजनीति में पार्टी बदलने की प्रवृत्ति किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है।

संविधान की दसवीं अनुसूची क्या कहती है?

भारत में दलबदल रोकने के लिए वर्ष 1985 में संविधान का 52वां संशोधन किया गया था। इसके तहत संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई।

इसे दलबदल विरोधी कानून कहा जाता है। इसका उद्देश्य निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को राजनीतिक फायदे के लिए पार्टी बदलने से रोकना है।

किन परिस्थितियों में जा सकती है सदस्यता?

दसवीं अनुसूची के तहत कुछ परिस्थितियों में सांसद या विधायक की सदस्यता समाप्त हो सकती है।

  • कोई सदस्य अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ देता है।
  • कोई सदस्य पार्टी के निर्देश के खिलाफ सदन में मतदान करता है या मतदान से दूर रहता है और पार्टी उसे निर्धारित समय में माफ नहीं करती।
  • कोई निर्दलीय सदस्य चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल हो जाता है।

हालांकि, इस कानून में कुछ अपवाद भी हैं। इनमें निर्धारित शर्तों के तहत राजनीतिक दलों का विलय शामिल है।

दलबदल विरोधी कानून में कहां हैं कमियां?

दलबदल विरोधी कानून लागू होने के बावजूद कई कारणों से इसका प्रभाव सीमित रहा है।

1. स्पीकर के फैसले में देरी

दलबदल से जुड़े मामलों में फैसला लेने की जिम्मेदारी लोकसभा या विधानसभा अध्यक्ष की होती है।

हालांकि, कानून में फैसला देने की कोई निश्चित समय-सीमा नहीं है। इससे कई मामले लंबे समय तक लंबित रहते हैं।

2. दो-तिहाई सदस्यों के विलय का प्रावधान

दसवीं अनुसूची के तहत किसी विधायक दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य किसी दूसरे दल में विलय करते हैं, तो उन्हें निर्धारित शर्तों के तहत अयोग्यता से छूट मिल सकती है।

इस प्रावधान के कारण बड़े समूह में पार्टी बदलने के मामलों में कानूनी स्थिति अलग हो जाती है।

3. इस्तीफा देकर पार्टी बदलने का रास्ता

कुछ नेता पार्टी बदलने से पहले अपने पद से इस्तीफा दे देते हैं। इसके बाद वे दूसरी पार्टी में शामिल होकर दोबारा चुनाव लड़ते हैं।

ऐसी स्थिति में दलबदल विरोधी कानून की अयोग्यता संबंधी प्रक्रिया से बचने का रास्ता खुल सकता है। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट में इस्तीफा देने वाले नेताओं पर चुनाव लड़ने की रोक लगाने की मांग उठी है।

दलबदल की राजनीति के पीछे क्या हैं कारण?

ADR की रिपोर्ट में दलबदल के पीछे कई कारणों का उल्लेख किया गया है।

इनमें सत्ता की चाहत, राजनीतिक लाभ, धनबल और बाहुबल का प्रभाव शामिल हैं। इसके अलावा, राजनीतिक दलों के बीच विचारधारा का अंतर भी कई बार कमजोर पड़ता दिखाई देता है।

इसी प्रवृत्ति को भारतीय राजनीति में ‘आया राम, गया राम’ की राजनीति कहा जाता है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी नजरें

सुप्रीम कोर्ट में उठे इस मुद्दे ने दलबदल विरोधी कानून की प्रभावशीलता पर नई बहस शुरू कर दी है।

यदि पांच साल तक चुनाव लड़ने पर रोक और उपचुनाव का खर्च वसूलने जैसी मांगों पर कोई फैसला आता है, तो इसका असर भारतीय राजनीति पर पड़ सकता है।

हालांकि, अभी अदालत ने केवल मामले पर विचार करने की सहमति जताई है। पांच साल के प्रतिबंध या उपचुनाव का खर्च वसूलने का कोई अंतिम आदेश नहीं दिया गया है।

अब इस मामले में केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के जवाब के बाद आगे की कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।

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