इजराइल चुनाव 2026इजराइल चुनाव 2026

इजराइल में 27 अक्टूबर 2026 को आम चुनाव प्रस्तावित हैं। इस चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति पर सबकी नजर रहेगी। वहीं, विपक्षी दल भी सरकार बनाने के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश करेंगे।

इजराइल की चुनाव प्रक्रिया भारत से काफी अलग है। यहां मतदाता सीधे प्रधानमंत्री का चुनाव नहीं करते। इसके बजाय, वे राजनीतिक पार्टियों को वोट देते हैं। फिर पार्टियों को मिले वोट के अनुपात में संसद की सीटें बांटी जाती हैं।

इजराइल की संसद को नेसेट कहा जाता है। इसमें कुल 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। इसलिए, चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनना भी सत्ता की गारंटी नहीं है।

इजराइल में चुनाव कैसे होता है?

इजराइल में मतदाता राष्ट्रीय चुनाव के दौरान किसी एक पार्टी को वोट देते हैं। इसके बाद देशभर में पार्टी को मिले वोटों के अनुपात में सीटें तय होती हैं। इस व्यवस्था को आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली कहा जाता है।

नेसेट का सामान्य कार्यकाल चार साल का होता है। हालांकि, राजनीतिक संकट के कारण समय से पहले चुनाव भी हो सकते हैं। प्रधानमंत्री के कार्यकाल पर कोई निश्चित संवैधानिक सीमा नहीं है।

61 सीटों पर क्यों टिकी रहती है नजर?

सरकार बनाने के लिए किसी नेता को नेसेट के कम से कम 61 सदस्यों का समर्थन चाहिए। लेकिन इजराइल में कोई पार्टी अकेले इतनी सीटें हासिल नहीं कर पाई है।

इसलिए, चुनाव के बाद पार्टियां गठबंधन बनाने के लिए बातचीत करती हैं। छोटी पार्टियां भी इस प्रक्रिया में अहम भूमिका निभा सकती हैं। उनके समर्थन से किसी बड़े दल का नेता प्रधानमंत्री बन सकता है।

इजराइल में वोटिंग और सीटों का गणित

इजराइल में किसी पार्टी को संसद में प्रवेश के लिए कुल वैध वोटों का कम से कम 3.25 प्रतिशत हासिल करना होता है। इस सीमा को चुनावी थ्रेशोल्ड कहा जाता है।

जो पार्टियां यह सीमा पार करती हैं, सीटों के बंटवारे में उनके वोट गिने जाते हैं। वहीं, सीमा से नीचे रहने वाली पार्टियां संसद में सीट हासिल नहीं कर पातीं।

बेडर-ऑफर कानून कैसे काम करता है?

इजराइल में सीटों का बंटवारा बेडर-ऑफर कानून के तहत होता है। इसमें पार्टियों को मिले वोटों के आधार पर सीटें निर्धारित की जाती हैं।

पहले, चुनावी सीमा पार करने वाली पार्टियों के वोटों का हिसाब लगाया जाता है। फिर सीटों के शुरुआती बंटवारे में प्रत्येक पार्टी को उसके वोटों के अनुपात में पूरी सीटें मिलती हैं।

इसके बाद बची हुई सीटों का आवंटन किया जाता है। इसमें पार्टी के वोटों और उसकी मौजूदा सीटों को ध्यान में रखा जाता है। इस प्रक्रिया के जरिए नेसेट की सभी 120 सीटें बांटी जाती हैं।

इजराइल में गठबंधन सरकार क्यों बनती है?

इजराइल की राजनीति में गठबंधन सरकारें आम हैं। इसकी प्रमुख वजह आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली है। इसमें कई पार्टियों को संसद में प्रतिनिधित्व मिलता है।

चुनाव के बाद सबसे बड़ी पार्टी को भी दूसरी पार्टियों के समर्थन की जरूरत पड़ सकती है। इसके लिए दलों के बीच नीतियों और सरकार में भागीदारी को लेकर बातचीत होती है।

हालांकि, गठबंधन बनाना आसान नहीं होता। यदि सहयोगी दलों के बीच मतभेद बढ़ते हैं, तो सरकार गिर सकती है। इसके बाद नए गठबंधन या समय से पहले चुनाव की स्थिति बन सकती है।

नेतन्याहू की सत्ता पर क्यों टिकी हैं नजरें?

इजराइल में 2019 से 2022 के बीच पांच आम चुनाव हुए थे। इस दौरान सरकारों का गठन और उनका गिरना देश की राजनीति का प्रमुख मुद्दा रहा।

2021 में नफ्ताली बेनेट और यायर लापिद ने कई दलों के समर्थन से गठबंधन सरकार बनाई थी। इस सरकार ने नेतन्याहू के लंबे कार्यकाल को समाप्त किया। हालांकि, यह सरकार भी ज्यादा समय तक नहीं चली।

नवंबर 2022 में नेतन्याहू फिर प्रधानमंत्री बने। अब आगामी चुनाव में उनकी पार्टी और सहयोगी दलों के प्रदर्शन पर नजर रहेगी।

इजराइल में कौन वोट दे सकता है?

इजराइल में आम तौर पर 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र के नागरिकों को मतदान का अधिकार है। चुनाव में यहूदी और अरब मूल के इजराइली नागरिक भाग ले सकते हैं।

हालांकि, कब्जे वाले वेस्ट बैंक और गाजा में रहने वाले फिलिस्तीनियों को इजराइली संसद के चुनाव में सामान्य रूप से वोट देने का अधिकार नहीं है। पूर्वी यरुशलम के ज्यादातर फिलिस्तीनियों के पास इजराइली नागरिकता के बजाय स्थायी निवास का दर्जा है। इसलिए, वे नेसेट चुनाव में मतदान नहीं कर सकते।

विदेश में रहने वाले इजराइली नागरिकों के लिए भी मतदान के नियम अलग हैं। सामान्य तौर पर उन्हें वोट डालने के लिए इजराइल में मौजूद होना पड़ता है। राजनयिकों और कुछ सरकारी प्रतिनिधियों को विदेश में मतदान की सुविधा मिलती है।

भारत और इजराइल की चुनाव प्रणाली में अंतर

भारत में लोकसभा चुनाव के दौरान मतदाता अपने निर्वाचन क्षेत्र के उम्मीदवार को वोट देते हैं। जिस उम्मीदवार को सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, वह सीट जीतता है। इस व्यवस्था को फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली कहा जाता है।

इसके विपरीत, इजराइल में मतदाता पार्टी को वोट देते हैं। पार्टियों को मिले वोटों के अनुपात में संसद की सीटें बांटी जाती हैं। इसलिए, छोटी पार्टियों को भी प्रतिनिधित्व मिलने का अवसर रहता है।

भारत में भी गठबंधन सरकार बन सकती है। हालांकि, इजराइल में गठबंधन का महत्त्व अधिक है, क्योंकि सरकार बनाने के लिए 61 सीटों का समर्थन जरूरी होता है।

इजराइल चुनाव 2026 में क्या होगा अहम?

आगामी चुनाव में केवल पार्टियों की सीटें ही महत्त्वपूर्ण नहीं होंगी। सरकार बनाने के लिए जरूरी गठबंधन और सहयोगी दलों का समर्थन भी निर्णायक रहेगा।

नेतन्याहू के लिए सत्ता बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी। वहीं, विपक्षी दलों को भी बहुमत जुटाने के लिए साझा रणनीति बनानी होगी।

इसलिए, चुनाव के बाद सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि कौन-सा गठबंधन नेसेट में 61 सीटों का समर्थन जुटा पाता है। इसी गणित से इजराइल की अगली सरकार तय होगी।

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