भारत में निजी क्षेत्र के लिए सोने के खनन का नया अध्याय शुरू हो गया है। आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले के जोन्नागिरी (अब स्वर्णगिरी) में देश की पहली बड़ी निजी गोल्ड माइन का संचालन शुरू हो गया है। करीब 400 करोड़ रुपये की लागत वाली इस परियोजना को भारतीय खनन क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इससे देश की सोने की आयात निर्भरता में तत्काल बड़ा बदलाव नहीं आएगा।
आंध्र प्रदेश गोल्ड माइन से कितनी मात्रा में निकलेगा सोना?
रिसर्च के अनुसार इस खदान में 13 टन से अधिक सोने के भंडार की पुष्टि हो चुकी है। आगे की खोज पूरी होने के बाद यह भंडार 42 टन तक पहुंच सकता है।
परियोजना के पहले चरण में लगभग 400 किलोग्राम सोना निकालने का लक्ष्य रखा गया है। उत्पादन धीरे-धीरे बढ़ाकर 900 किलोग्राम से 1 टन प्रति वर्ष तक किया जाएगा। अनुमान है कि यह खदान करीब 15 वर्षों तक उत्पादन करेगी।
यह परियोजना ओपन-पिट माइनिंग तकनीक पर आधारित है, जिसमें जमीन के नीचे सुरंग बनाने के बजाय खुले गड्ढे के माध्यम से खनन किया जाता है।
भारत में सोने का खनन नया नहीं, लेकिन निजी क्षेत्र के लिए नई शुरुआत
भारत को प्राचीन काल से ही “सोने की चिड़िया” कहा जाता रहा है। आधुनिक दौर में बड़े पैमाने पर सोने का खनन ब्रिटिश शासन के दौरान कर्नाटक स्थित कोलार गोल्ड फील्ड्स (KGF) से शुरू हुआ था।
करीब 120 वर्षों तक संचालित रही KGF खदान से 800 से 900 टन सोना निकाला गया। एक समय भारत के कुल सोना उत्पादन का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा इसी खदान से आता था।
KGF क्यों बंद हुई?
साल 1956 में KGF का राष्ट्रीयकरण किया गया और इसका संचालन भारत गोल्ड माइन्स लिमिटेड (BGML) को सौंपा गया।
समय के साथ उत्पादन लगातार घटता गया, जबकि खनन लागत बढ़ती रही। अंततः आर्थिक रूप से घाटे का सौदा बनने के कारण 2001 में KGF को बंद करना पड़ा।
आज भी यह भारत के खनन इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण सोने की खदानों में गिनी जाती है।
भारत में अभी कितना सोना निकलता है?
वर्तमान में कर्नाटक की हुत्ती गोल्ड माइन्स से हर वर्ष लगभग 1 से 1.5 टन सोने का उत्पादन होता है। अन्य राज्यों में भी सीमित स्तर पर खनन जारी है।
इसके मुकाबले भारत हर वर्ष लगभग 700 से 800 टन सोना आयात करता है। ऐसे में घरेलू उत्पादन अभी भी देश की कुल मांग का बेहद छोटा हिस्सा है।
दुनिया के बड़े सोना उत्पादकों में भारत कहां खड़ा है?
वैश्विक स्तर पर सोना उत्पादन में चीन पहले स्थान पर है, जहां हर वर्ष लगभग 370 से 380 टन सोना निकाला जाता है।
इसके बाद—
- चीन – 370-380 टन
- रूस – लगभग 325 टन
- ऑस्ट्रेलिया – 280-290 टन
- कनाडा – लगभग 200 टन
दक्षिण अफ्रीका कभी दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक था, लेकिन अब वहां उत्पादन घटकर करीब 100 टन रह गया है। भारत अभी इन देशों से काफी पीछे है।
क्या नई गोल्ड माइन से भारत की तस्वीर बदलेगी?
विशेषज्ञों के अनुसार यदि आंध्र प्रदेश की इस खदान से हर वर्ष 1 टन सोना भी निकलता है, तब भी इसका भारत के कुल आयात पर सीमित प्रभाव पड़ेगा।
भारत ने पिछले वर्ष लगभग 7,200 करोड़ डॉलर मूल्य का सोना आयात किया था। इसलिए केवल एक परियोजना से आयात निर्भरता कम होने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
हालांकि यह परियोजना निजी निवेश के लिए एक सकारात्मक संकेत मानी जा रही है। यदि यह सफल रहती है, तो ओडिशा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश के अन्य संभावित क्षेत्रों में भी निजी कंपनियां नई सोने की खदानों की तलाश तेज कर सकती हैं।
पाकिस्तान भी बढ़ा रहा है गोल्ड माइनिंग पर दांव
रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान भी अपने खनिज संसाधनों के दोहन पर तेजी से काम कर रहा है। बलूचिस्तान की रेको डीक (Reko Diq) परियोजना में करीब 1,270 टन सोना होने का अनुमान है।
योजना के अनुसार वर्ष 2028 से उत्पादन शुरू किया जाएगा। शुरुआती चरण में हर वर्ष 7 से 8 टन सोना निकालने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि सुरक्षा चुनौतियां इस परियोजना के सामने बड़ी बाधा बनी हुई हैं।
भारत के लिए क्या हैं आगे की संभावनाएं?
आंध्र प्रदेश की पहली बड़ी निजी गोल्ड माइन भारत के खनन क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इससे देश तुरंत सोने के मामले में आत्मनिर्भर नहीं बनेगा, लेकिन निजी निवेश और आधुनिक तकनीक के जरिए भविष्य में घरेलू उत्पादन बढ़ाने का रास्ता जरूर खुलेगा।
यदि आने वाले वर्षों में नई खोजें सफल होती हैं और पर्यावरणीय मानकों का पालन करते हुए खनन का विस्तार होता है, तो भारत धीरे-धीरे अपनी आयात निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
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