राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के रामजस महाविद्यालय में शनिवार को “भारत मंथन 2026” के पांच दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन सत्र आयोजित किया गया। “मानव कल्याण के परिप्रेक्ष्य में पंच परिवर्तन का क्रियान्वयन: चुनौतियाँ व समाधान” विषय पर केंद्रित इस संगोष्ठी में देशभर के शिक्षाविदों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने भाग लिया।
इस संगोष्ठी का संयुक्त आयोजन इंद्रप्रस्थ अध्ययन केंद्र, दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय सहित विभिन्न संस्थानों द्वारा किया गया।
समापन सत्र की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन और सरस्वती वंदना के साथ हुई। इस अवसर पर श्री जे. नंद कुमार (राष्ट्रीय संयोजक, प्रज्ञा प्रवाह) मुख्य वक्ता, प्रो. टंकेश्वर (कुलपति, हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय) सत्राध्यक्ष तथा प्रो. बलराम पाणि (अधिष्ठाता महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय) विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
मुख्य वक्ता श्री जे. नंद कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि ‘डॉलरिज्म’ के प्रभाव को संतुलित करने के लिए भारत को स्वदेशी को अपनाना होगा। उन्होंने कहा कि रुपये को सशक्त बनाने में प्रत्येक नागरिक की भूमिका महत्वपूर्ण है और अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों के प्रति सजग रहना भी आवश्यक है। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के विचारों का उल्लेख करते हुए ‘स्व’ की अवधारणा और आत्मबोध पर बल दिया, साथ ही युवाओं को पंच परिवर्तन के मूल्यों को अपनाने के लिए प्रेरित किया।
सत्राध्यक्ष प्रो. टंकेश्वर ने अपने संबोधन में कहा कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया व्यक्तिगत परिवर्तन से प्रारंभ होती है। उन्होंने पंच परिवर्तन की अवधारणा को व्यवहारिक जीवन में लागू करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि विश्व मानव कल्याण और स्वावलंबन के लिए इन विषयों की गहन समझ जरूरी है।
प्रो. बलराम पाणि ने पंच परिवर्तन की तुलना पंचतत्वों से करते हुए कहा कि जिस प्रकार मानव शरीर के संतुलन के लिए पंचतत्व आवश्यक हैं, उसी प्रकार राष्ट्र के संतुलित और समग्र विकास के लिए पंच परिवर्तन अनिवार्य हैं।
कार्यक्रम में प्रो. गीता भट्ट (निदेशक, एनसीडब्ल्यूईबी) ने पांच दिवसीय संगोष्ठी का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करते हुए सभी सहयोगी संस्थानों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
इस अवसर पर इंद्रप्रस्थ अध्ययन केंद्र के प्रमुख श्री विनोद शर्मा ‘विवेक’ ने अतिथियों का स्वागत किया, जबकि सह-प्रमुख प्रो. राकेश कुमार पांडेय ने केंद्र की कार्यप्रणाली और उद्देश्यों पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम में प्रो. अशोक कुमार नागावत, प्रो. आर.एन. दुबे, प्रो. अजय कुमार अरोड़ा सहित विभिन्न विश्वविद्यालयों और संस्थानों के कई गणमान्य शिक्षाविद एवं प्रतिनिधि उपस्थित रहे।
संगोष्ठी के दौरान शोध-पत्र प्रस्तुतियों में भी व्यापक सहभागिता देखने को मिली। देश के विभिन्न राज्यों से आए प्रतिभागियों ने समसामयिक विषयों पर अपने शोध प्रस्तुत किए। कुल 395 पंजीकृत प्रतिभागियों में से 166 शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए, जबकि समापन दिवस पर 48 प्रतिभागियों ने अपनी प्रस्तुतियां दीं।
कार्यक्रम का समापन धन्यवाद ज्ञापन के साथ किया गया, जिसमें सभी प्रतिभागियों, वक्ताओं और सहयोगी संस्थानों के योगदान की सराहना की गई।
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