मिडिल ईस्ट की राजनीति एक बार फिर चर्चा में है। ईरान परमाणु समझौते को लेकर जारी कूटनीतिक प्रयासों के बीच अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान जैसे मुस्लिम देशों से अब्राहम समझौते में शामिल होने की अपील की है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब इजराइल और कई मुस्लिम देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाने की कोशिशें तेज हो रही हैं।
अमेरिकी रिपब्लिकन सीनेटर और पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी माने जाने वाले लिंडसे ग्राहम ने कहा कि मिडिल ईस्ट में स्थिरता और सामान्य स्थिति कायम करने के लिए इस समझौते का विस्तार जरूरी है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप प्रशासन इस समझौते को और व्यापक बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है।
क्या है अब्राहम समझौता?
अब्राहम समझौता (Abraham Accord) अमेरिका की पहल पर शुरू किया गया एक बड़ा कूटनीतिक समझौता है। इसका उद्देश्य इजराइल और अरब मुस्लिम देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाना है।
इस समझौते का नाम नबी इब्राहीम (अब्राहम) के नाम पर रखा गया है, जिन्हें इस्लाम, ईसाई और यहूदी धर्म में समान रूप से सम्मान दिया जाता है। अमेरिका ने वर्ष 2020 में इस समझौते की शुरुआत की थी।
सबसे पहले संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद बहरीन, मोरक्को और सूडान भी इसमें शामिल हुए। उस समय डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति थे और इसे उनकी बड़ी विदेश नीति उपलब्धि माना गया था।
अमेरिका क्यों चाहता है समझौते का विस्तार?
विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका मिडिल ईस्ट में अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत करना चाहता है। इसके पीछे कई बड़े कारण बताए जा रहे हैं।
1. चीन और रूस के प्रभाव को रोकना
अमेरिका मिडिल ईस्ट स्ट्रैटजिक अफेयर्स (MESA) के तहत एक मजबूत क्षेत्रीय गठबंधन बनाना चाहता है। इसमें इजराइल, सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान जैसे देशों की भूमिका अहम मानी जा रही है। अमेरिका का लक्ष्य क्षेत्र में चीन और रूस के बढ़ते प्रभाव को सीमित करना है।
2. मुस्लिम देशों में इजराइल की स्वीकार्यता बढ़ाना
फिलिस्तीन संघर्ष के कारण कई मुस्लिम देशों में इजराइल को लेकर विरोध की भावना रही है। अमेरिका चाहता है कि मुस्लिम देश इजराइल के साथ व्यापार, रक्षा और कूटनीतिक संबंध मजबूत करें। अगर सऊदी अरब और पाकिस्तान जैसे बड़े मुस्लिम देश इसमें शामिल होते हैं, तो इजराइल की स्वीकार्यता मुस्लिम दुनिया में बढ़ सकती है।
3. ईरान और तालिबान पर नियंत्रण की रणनीति
अमेरिका ईरान और तालिबान को क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती मानता है। पाकिस्तान को इस समझौते में शामिल करने के पीछे एक बड़ा कारण यह भी माना जा रहा है। पाकिस्तान परमाणु शक्ति संपन्न पहला मुस्लिम देश है और क्षेत्रीय राजनीति में उसकी अहम भूमिका है।
4. ट्रंप की राजनीतिक रणनीति
क्विंसी इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञ त्रिता पारसी के मुताबिक, ट्रंप अब्राहम समझौते को आगे बढ़ाकर इजराइल समर्थक छवि मजबूत करना चाहते हैं। माना जा रहा है कि ईरान के साथ संभावित समझौतों को लेकर इजराइल में असंतोष है। ऐसे में ट्रंप यहूदी समुदाय का समर्थन बनाए रखना चाहते हैं।
पाकिस्तान और सऊदी अरब के सामने बड़ी चुनौती
विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान और सऊदी अरब के लिए इस समझौते में शामिल होना आसान नहीं होगा।
अटलांटिक काउंसिल के दक्षिण एशिया विशेषज्ञ माइकल कुघलमैन के अनुसार, पाकिस्तान में फिलिस्तीन मुद्दा बेहद संवेदनशील है। वहां की जनता इजराइल के साथ खुले संबंधों का विरोध कर सकती है।
हालांकि पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इस समझौते में शामिल होने की संभावना से इनकार किया है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अंतिम निर्णय सरकार और सेना के रणनीतिक हितों को ध्यान में रखकर लिया जाएगा।
सऊदी अरब भी फिलिस्तीन मुद्दे को लेकर सावधानी बरत रहा है। हालांकि हाल के वर्षों में सऊदी और इजराइल के बीच अप्रत्यक्ष संपर्क बढ़े हैं, लेकिन सार्वजनिक तौर पर संबंध सामान्य करने का फैसला अभी भी संवेदनशील माना जाता है।
मिडिल ईस्ट की राजनीति पर क्या होगा असर?
अगर सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान जैसे देश अब्राहम समझौते में शामिल होते हैं, तो मिडिल ईस्ट की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार इससे इजराइल और मुस्लिम देशों के बीच आर्थिक, रक्षा और तकनीकी सहयोग बढ़ेगा। साथ ही अमेरिका की क्षेत्रीय रणनीति को भी मजबूती मिलेगी।
हालांकि फिलिस्तीन मुद्दे को लेकर कई मुस्लिम देशों में विरोध की संभावना भी बनी रहेगी। यही वजह है कि आने वाले समय में यह समझौता वैश्विक राजनीति का बड़ा विषय बना रह सकता है।
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