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3 जनवरी की रात जब अमेरिका ने निकोलस मादुरो को गिरफ्तार किया, तो यह केवल एक राजनीतिक घटना नहीं रही। इस कदम ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार की ओर खींच दिया। इसके तुरंत बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों में हलचल मचा दी। ट्रंप ने संकेत दिए कि अमेरिकी तेल कंपनियां वेनेजुएला के जर्जर तेल सेक्टर में निवेश कर सकती हैं, ताकि उत्पादन बढ़ाकर अमेरिका और अन्य देशों को तेल की आपूर्ति की जा सके।

लेकिन सवाल यह है कि क्या वेनेजुएला का तेल एक बार फिर अमेरिका और दुनिया की ऊर्जा जरूरतों का सहारा बन पाएगा, या यह 100 अरब डॉलर का एक और जोखिम भरा जुआ साबित होगा?

दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार, लेकिन खंडहर बन चुका सेक्टर

वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित तेल भंडार है—करीब 303 अरब बैरल। इसके बावजूद आज उसका तेल उद्योग किसी खजाने से ज्यादा एक खंडहर जैसा दिखता है। जंग लगी पाइपलाइनें, बंद पड़ी रिफाइनरियां, लूटे गए ड्रिलिंग रिग्स और कमजोर प्रशासन ने इस सेक्टर को लगभग पंगु बना दिया है।

1970 और 1980 के दशक में वेनेजुएला लैटिन अमेरिका का सबसे अमीर देश माना जाता था। रोजाना लाखों बैरल तेल निकलता था और कराकस जैसे शहर आधुनिकता की पहचान थे। लेकिन सरकार द्वारा तेल क्षेत्र पर पूर्ण नियंत्रण, विदेशी कंपनियों की विदाई और राजनीतिक हस्तक्षेप ने हालात बदल दिए। सरकारी तेल कंपनी PDVSA पर राजनीति हावी हो गई, निवेश ठप पड़ गया और अनुभवी इंजीनियर देश छोड़कर चले गए।

मादुरो की गिरफ्तारी और राजनीतिक अनिश्चितता

मादुरो की गिरफ्तारी ने वेनेजुएला की राजनीति को और अनिश्चित बना दिया है। अमेरिका और उसके सहयोगी लंबे समय से मादुरो सरकार पर लोकतंत्र और मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप लगाते रहे हैं। अमेरिका को उम्मीद है कि सत्ता परिवर्तन के बाद निवेश का रास्ता खुलेगा, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि असली चुनौती राजनीतिक स्थिरता है।
जब तक यह भरोसा नहीं होगा कि सरकार टिकाऊ है और नीतियां बार-बार नहीं बदलेंगी, तब तक कोई भी कंपनी अरबों डॉलर का निवेश करने का जोखिम नहीं उठाएगी।

अमेरिका के सामने 100 अरब डॉलर की चुनौती

राइस यूनिवर्सिटी के एनर्जी पॉलिसी डायरेक्टर फ्रांसिस्को मोनाल्डी के अनुसार, अगर वेनेजुएला को 1970 के दशक के उत्पादन स्तर तक पहुंचाना है, तो अगले दस वर्षों तक हर साल करीब 10 अरब डॉलर का निवेश जरूरी होगा। यानी कुल खर्च 100 अरब डॉलर से अधिक
यह निवेश सिर्फ तेल निकालने के लिए नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम—पाइपलाइन, बंदरगाह, रिफाइनरी, ड्रिलिंग रिग्स और सुरक्षा व्यवस्था—को नए सिरे से खड़ा करने के लिए होगा।

बंदरगाह, पाइपलाइन और सुरक्षा: सबसे बड़ी बाधा

आज वेनेजुएला के तेल बंदरगाहों की हालत बेहद खराब है। चीन जाने वाले सुपरटैंकर को पूरी तरह लोड करने में पांच दिन तक लग जाते हैं, जबकि कुछ साल पहले यही काम एक दिन में हो जाता था।
पाइपलाइन नेटवर्क जगह-जगह से लीक हो रहा है, कई जगह पाइपलाइनें उखाड़कर कबाड़ में बेच दी गई हैं। तेल क्षेत्रों में चोरी, आगजनी और धमाके आम हो चुके हैं। इन हालात में उत्पादन बढ़ाना लगभग असंभव लगता है।

शेवरॉन पर टिकी अमेरिका की उम्मीद

फिलहाल वेनेजुएला का ज्यादातर तेल उत्पादन अमेरिकी कंपनी Chevron के भरोसे चल रहा है। यह कंपनी देश के कुल उत्पादन का करीब 25 प्रतिशत संभालती है, वह भी एक विशेष अमेरिकी लाइसेंस के तहत।
शेवरॉन बेहद सतर्क है और किसी बड़े विस्तार से पहले राजनीतिक स्थिरता का इंतजार कर रही है। यह दिखाता है कि कंपनियों का भरोसा अभी पूरी तरह बहाल नहीं हुआ है।

कम उत्पादन की कड़वी सच्चाई

चॉइस ब्रोकिंग की रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर 2025 में वेनेजुएला का तेल उत्पादन सिर्फ 9 लाख बैरल प्रतिदिन रहा, जबकि 2010 के शुरुआती वर्षों में यह करीब 20 लाख बैरल प्रतिदिन था।
रिपोर्ट कहती है कि 2026 में सबसे अच्छे हालात में भी उत्पादन में केवल 1.5 लाख बैरल प्रतिदिन की बढ़ोतरी संभव है। बड़े नतीजों के लिए 2027 से पहले उम्मीद करना मुश्किल है।

ब्लूमबर्ग रिपोर्ट और निवेश का जोखिम

Bloomberg की रिपोर्ट भी बताती है कि वेनेजुएला का तेल ढांचा बेहद खराब हालत में है। कई रिफाइनरियों की यूनिट बंद हैं, सुरक्षा कमजोर है और प्रशासनिक नियंत्रण ढीला है। विशेषज्ञ मानते हैं कि पहले स्थिरता, सुरक्षा और पारदर्शिता लानी होगी, तभी निवेश का असर दिखेगा।

भारत के लिए क्या मायने हैं?

अगर वेनेजुएला में हालात सुधरते हैं, तो भारत को भी फायदा हो सकता है। भारत पहले वेनेजुएला से रोज करीब 4 लाख बैरल सस्ता भारी कच्चा तेल आयात करता था। आपूर्ति बहाल होने पर भारतीय रिफाइनरियों की लागत कम हो सकती है और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो सकती है।

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