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चार राज्यों की 28 विधान परिषद सीटों पर हुए चुनाव के नतीजों में बीजेपी और उसके सहयोगियों ने कुल 15 सीटों पर जीत दर्ज की है। हालांकि, पार्टी को कई महत्वपूर्ण सीटों पर हार का सामना करना पड़ा। बिहार के पटना और दरभंगा, उत्तर प्रदेश के काशी और लखनऊ तथा महाराष्ट्र के नागपुर में बीजेपी की हार चर्चा का विषय बनी हुई है।

इन नतीजों में बीजेपी ने 12 सीटें जीतीं, जबकि उसके सहयोगियों को तीन सीटें मिलीं। दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने भी कई महत्वपूर्ण सीटों पर जीत हासिल की। चुनाव में स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की सीटें शामिल थीं।

बिहार में पटना और दरभंगा सीटों पर बीजेपी हारी

बिहार में विधान परिषद की आठ सीटों के नतीजे सामने आए हैं। यहां बीजेपी को पटना शिक्षक और दरभंगा स्नातक सीट पर हार का सामना करना पड़ा। इन दोनों सीटों के परिणाम राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

पटना शिक्षक सीट पर आरजेडी की जीत

पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में आरजेडी के संजीव कुमार ने बीजेपी के नवल किशोर यादव को हराया। यादव इस सीट का लंबे समय से प्रतिनिधित्व कर रहे थे। उनकी हार को बीजेपी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।

दरभंगा स्नातक सीट पर भी बीजेपी उम्मीदवार सर्वेश कुमार चुनाव हार गए। वह 2020 में इस सीट से जीतकर विधान परिषद पहुंचे थे।

बिहार की आठ सीटों में बीजेपी और आरजेडी को दो-दो सीटें मिलीं। इसके अलावा दो सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की। जन सुराज और जेडीयू को एक-एक सीट मिली।

बीजेपी के लिए क्यों अहम हैं ये नतीजे?

पटना और दरभंगा की हार इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का संबंध पटना से है। वहीं, बिहार बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी दरभंगा से आते हैं।

इन नतीजों के बाद बिहार में शिक्षक और स्नातक मतदाताओं के बीच राजनीतिक दलों के समर्थन को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

उत्तर प्रदेश में काशी और लखनऊ में झटका

उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की 11 सीटों के लिए चुनाव हुए। इनमें बीजेपी ने छह सीटें जीतीं, जबकि समाजवादी पार्टी को पांच सीटों पर जीत मिली।

हालांकि, बीजेपी के लिए काशी और लखनऊ के परिणाम चुनौतीपूर्ण रहे। वाराणसी यानी काशी की दोनों सीटों पर पार्टी को हार मिली। इसके अलावा लखनऊ की दो सीटों में से एक सीट पर भी बीजेपी चुनाव हार गई।

लखनऊ स्नातक सीट पर सपा की जीत

लखनऊ स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में समाजवादी पार्टी की कांति पटेल ने जीत हासिल की। इसके अलावा आगरा और इलाहाबाद की सीटों पर भी बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा।

सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने नतीजों पर प्रतिक्रिया देते हुए बीजेपी पर निशाना साधा। उन्होंने वाराणसी में पार्टी की हार को लेकर टिप्पणी की।

इन नतीजों ने उत्तर प्रदेश में बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच राजनीतिक मुकाबले को फिर चर्चा में ला दिया है।

नागपुर में कांग्रेस ने बीजेपी को हराया

महाराष्ट्र में विधान परिषद की पांच सीटों के लिए चुनाव कराए गए। इनमें तीन सीटों पर इंडिया गठबंधन और दो सीटों पर एनडीए गठबंधन ने जीत दर्ज की।

नागपुर स्नातक सीट पर कांग्रेस की जीत सबसे अधिक चर्चा में रही। नागपुर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का गृह नगर है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का भी इस शहर से संबंध है।

नागपुर के नतीजे क्यों हैं महत्वपूर्ण?

नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय भी स्थित है। ऐसे में यहां बीजेपी की हार को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

हालांकि, यह पहला मौका नहीं है जब बीजेपी को इस सीट पर हार मिली हो। वर्ष 2020 में भी पार्टी को नागपुर स्नातक सीट पर हार का सामना करना पड़ा था।

कर्नाटक में बीजेपी-जेडीएस गठबंधन का प्रदर्शन

कर्नाटक में विधान परिषद की चार सीटों के लिए चुनाव हुए। यहां बीजेपी ने तीन सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि उसकी सहयोगी जेडीएस को एक सीट मिली।

इस तरह एनडीए गठबंधन ने सभी चार सीटों पर जीत हासिल की। दूसरी ओर, सत्ताधारी कांग्रेस को इन निर्वाचन क्षेत्रों में सफलता नहीं मिली।

कर्नाटक के नतीजे अन्य राज्यों से अलग रहे। यहां बीजेपी और जेडीएस गठबंधन का प्रदर्शन मजबूत रहा।

MLC चुनाव परिणामों से क्या संकेत मिलते हैं?

चार राज्यों के नतीजों में बीजेपी और उसके सहयोगियों ने कुल 15 सीटें जीतीं। यह संख्या 28 सीटों में आधे से अधिक है। इसके बावजूद कई महत्वपूर्ण निर्वाचन क्षेत्रों में हार ने राजनीतिक चर्चा को जन्म दिया है।

पटना, दरभंगा, काशी, लखनऊ और नागपुर में हार के कारण पार्टी के प्रदर्शन का क्षेत्रवार आकलन किया जा रहा है। वहीं, कर्नाटक में गठबंधन की जीत ने बीजेपी के लिए राहत दी है।

इन चुनावों में शिक्षक और स्नातक मतदाताओं ने मतदान किया। इसलिए नतीजों को इन वर्गों के राजनीतिक रुझान के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। हालांकि, विधान परिषद चुनावों के परिणामों के आधार पर व्यापक मतदाता रुझान या विधानसभा चुनावों के नतीजों का सीधा अनुमान लगाना उचित नहीं होगा।\

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