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उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सियासी मजबूती के लिए अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा बैकबोन का काम करती रही है, जिसके सहारे मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश यादव तक सत्ता के सिंहासन तक पहुंचे. मुलायम सिंह की सरपरस्ती में वर्षों तक चलने वाले अखिल भारतीय यादव महासभा पर सपा की पकड़ दिन ब दिन कमजोर होती जा रही है तो बीजेपी का दबदबा बढ़ता जा रहा. यादव महासभा के अब दो फाड़ होने जा रहे हैं. यादव महासभा से जुड़े हुए कुछ लोगों ने अलग ‘यादव मंच’ बना कर सपा की सियासत की छत्रछाया से खुद को अलग करने का फैसला किया है, जो अखिलेश यादव के लिए बड़ा झटका है.

लोकसभा चुनाव से पहले यूपी की सियासत में सपा प्रमुख अखिलेश यादव राजनीतिक चक्रव्यूह में घिरते जा रहे हैं. बीजेपी ने मोहन यादव को एमपी का मुख्यमंत्री बनाकर पहले ही यूपी, बिहार, राजस्थान सहित हरियाणा के यादव समुदाय का साधने का दांव चल रही है. अखिलेश की पकड़ से पहले ही बाहर निकल चुकी अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा की कमान यूपी में अरुण यादव के हाथों में है, जो बीजेपी से जुड़े हुए हैं. पिछले दिनों शहजहांपुर में हुए यादव महासभा के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर योगी सरकार के मंत्री सुरेश खन्ना शामिल हुए थे. अखिल भारतीय यादव महासभा के कार्यकारी अध्यक्ष का जिम्मा पहले से ही बसपा के सांसद श्याम सिंह यादव के हाथों में है, जो बीजेपी के साथ अपनी नजदीकियां बढ़ा रहे हैं. बीजेपी यूपी की सियासत में कांटे से अपनी सियासी राह के कांटे को निकालने का प्रयास चल रही है, जो सपा और अखिलेश यादव के लिए चिंता बढ़ा सकता है.

यादव महासभा का गठन

बता दें कि अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा का गठन आजादी से पहले 1924 में हुई है. मैनपुरी में इसकी स्ठापना हुई थी. चौधरी बदन सिंह यादव से लेकर अभी तक कुल 46 अध्यक्ष चुने गए हैं. इनमें से ज्यादातर अध्यक्ष उत्तर प्रदेश के रहे हैं, जो मुलायम सिंह यादव की सियासत में अहम योगदान दे रहे हैं. चौधरी राम गोपाल से लेकर चौधरी हरमोहन सिंह और पूर्व सांसद उदय प्रताप सिंह तक ने यादव महासभा की कमान संभाली. महासभा के ये तीनों ही अध्यक्ष सपा से जुड़े रहे हैं और मुलायम सिंह यादव के करीबी माने जाते थे. चौधरी हरिमोहन सिंह और उदय प्रताप सपा के सांसद रह चुके हैं. इन दोनों ही नेताओं की मुलायम सिंह से नजदीकियां भी जगजाहिर हैं.

यादव महासभा का सपा को खड़ा करने में अहम रोल

अखिल भारती यादव महासभा किसी न किसी रूप में सपा को खाद-पानी देने का कार्य करती रही तो बिहार में लालू प्रसाद यादव को मजबूत करने का काम करती थी. 1967 में मुलायम सिंह यादव के मंत्री बनने से लेकर 1989 में मुख्यमंत्री बने और इसके बाद समाजवादी पार्टी को यूपी में खड़ा करने में यादव महासभा का अहम रोल रहा है. महासभा पर अपनी पकड़ रखते हुए मुलायम सिंह सूबे के सबसे बड़े यादव नेता के तौर पर अपनी पहचान बनाई. यूपी में यादव वोटों के दम पर मुलायम सिंह यादव तीन बार मुख्यमंत्री बने तो अखिलेश यादव भी सत्ता के सिंहासन पर विराजमान हुए. पिछले साल उदय प्रताप सिंह ने अखिल भारती यादव महासभा का अध्यक्ष पद छोड़ दिया था, जिसके बाद पश्चिम बंगाल से आने वाले डॉ. सगुन घोष को कमान सौंपी गई है तो बसपा सांसद श्याम सिंह यादव को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है. यहीं से शुरू होती है यादव महासभा से सपा की पकड़ कमजोर होनी और बीजेपी के दखल बढ़ने की कहानी.

सपा की छाया से दूर हो रहा यादव महासभा

चौधरी हरमोहन सिंह का परिवार अब बीजेपी के साथ है तो यादव महासभा की कमान सपा नेताओं के हाथों से निकलकर बसपा और बीजेपी नेताओं को हाथों में पहुंच गई है. ऐसे में साफ जाहिर होता है कि यादव महासभा पर सपा की पकड़ दिन ब दिन कमजोर होती जा रही है और बीजेपी का दखल बढ़ता जा रहा है. पीएम मोदी के खिलाफ वाराणसी लोकसभा सीट से सपा के टिकट पर चुनाव लड़ चुकी शालिनी यादव ने अखिलेश यादव का साथ छोड़ दिया है और बीजेपी का दामन थाम ली है. ऐसे में शालिनी यादव के पति अरुण यादव भी बीजेपी की सदस्यता ग्रहण कर लिए हैं, जो यूपी में यादव महासभा की कमान संभाल रहे हैं और यादव समुदाय के मंच पर बीजेपी नेताओं का जमघट भी लग रहा है. मोहन यादव को सीएम बनाए जाने का सियासी असर यूपी में यादव सियासत पर भी दिखने लगा है, जिसके चलते ही यादव महासभा अब सपा की छाया से पूरी तरह से बाहर निकालने का फैसला कर लिया है.

किसी एक दल के लिए काम नहीं करेगी महासभा

यादव महासभा से कैप्तान सिंह यादव ने खुद को अलग कर अपना एक सामानांतर संगठन बनाया और प्रदेश अध्यक्ष बन गए हैं. वहीं, अब यादव महासभा से जुड़े हुए यादव समुदाय के एक बड़ा धड़ा लखनऊ के गोमती होटल में गुरुवार को बैठक कर रहा है, जो यादव मंच के नाम से सामाजिक संगठन बनाने का ऐलान करेंगे. यादव मंच के संयोजक अनुराग यादव ने बताया कि यादव महासभा सामाजिक संगठन के बजाय राजनीतिक संगठन के तौर पर काम कर रहा है, जिसके चलते ही एक अलग मंच बनाने का फैसला किया गया है. यह मंच किसी भी एक राजनीतिक दल के लिए काम नहीं करेगा बल्कि यादव समाज के लिए काम करेगा. यादव समुदाय जिस भी दल से उतरेंगे, उसकी मदद करने का काम करेंगे.

अनुराग यादव कहते हैं कि सपा चार बार यूपी की सत्ता में रही, लेकिन यादव महासभा के पास अपना एक कार्यलय तक नहीं है. सपा की छाया में रहने से समाज और महासभा को क्या मिला है. इन्हीं सारी बातों को देखते हुए यादव महासभा और कप्तान यादव के साथ जुड़े हुए लोग मिलकर यादव मंच का गठन करने का फैसला किया है. महासभा से जुड़े रहे अशोक यादव, सीएल यादव, राजेंद्र यादव, केशर यादव, राम नरेश यादव, भारत भूषण यादव और दिनेश यादव जैसे लोग यादव मंच के साथ आए हैं. यादव समुदाय के अंदर सियासी बेचैनी दिख रही है, जिसे कोई भी एड्रेस नहीं कर रहा है. यादव समुदाय पर किसी भी दल के साथ जुड़कर काम नहीं करेगा.

यादव महासभा का सपा से मोहभंग

यादव महासभा का समाजवादी पार्टी से मोह भंग होना अखिलेश यादव के लिए झटके के तौर पर देखा जा रहा है. हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में एमपी, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में जिस तरह से बीजेपी को जीत मिली है, उसमें यादव वोटों का अहम रोल था. राजस्थान और मध्य प्रदेश में यादव समुदाय ने एकमुश्त होकर बीजेपी को वोट किए हैं, जिसके चलते ही पार्टी ने मोहन यादव को एमपी की सत्ता की कमान सौंपी है. बिहार में यादव समुदाय को साधने के लिए बड़े समय से बीजेपी प्रयास कर रही है, जिसके यादव समुदाय से आने वाले केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय को आगे बढ़ा रही है. केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव पहले से ही बीजेपी में काफी पावरफुल है तो राजस्थान में यादव समुदाय से आने वाले महंत बालकनाथ का भी सियासी कद बढ़ाया जा रहा है.

बीजेपी कैसे यादवों में बढ़ा रही आधार

हरियाणा में बीजेपी के यादव समुदाय का चेहरा राव इंद्रजीत माने जाते हैं और उनका प्रभाव राजस्थान तक है. यूपी में बीजेपी के टिकट पर दो यादव समुदाय के विधायक बने हैं, जिसमें से एक को योगी सरकार में मंत्री बनाया गया है. इसके अलावा दो एमएलसी, दो राज्यसभा सदस्य और एक लोकसभा सदस्य यादव समुदाय से हैं. बीजेपी के टिकट पर चार यादव जिला पंचायत अध्यक्ष भी बने हैं. सूबे में यादव समुदाय के कद्दावर नेता हरिओम यादव का परिवार बीजेपी के साथ खड़ा है. यादव बहुल जिलों में पूरी तरह से बीजेपी का कब्जा है. यादव महासभा के अध्यक्ष रह चुके चौधरी हरिमोहन सिंह यादव की 10वीं पुण्यतिथि पर पीएम नरेंद्र मोदी शामिल हुए, जिसे बीजेपी की रणनीति का हिस्सा माना गया था.

बीजेपी ने अपनी संसदीय बोर्ड में दो यादव नेताओं को जगह दी है. इन सब बातों से एक चीज साफ होती है कि अखिलेश यादव के लिए अपने यादव वोटबैंक को बचाए रखने की चुनौती खड़ी हो रही. अखिलेश यादव सपा की यादव परस्त वाली छवि को तोड़ने की कवायद भी कर रहे थे, जिसके लिए उन्होंने पीडीए का नारा दिया है. इस तरह से यादव समुदाय के बैठकों से खुद को दूरी बनाए रखा, जिसका असर यह हुआ कि यादव महासभा उनकी पकड़ से निकल गई. अब यादव महासभा भी खुद को सपा की बी-टीम के तमगे को खत्म करने की दिशा में है. ऐसे में करवट लेती यादव महासभा को दो फाड़ और बीजेपी के बढ़ते प्रभाव से अखिलेश यादव की चिंता बढ़ सकती है

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