45 वर्षीय नितिन नवीन के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अध्यक्ष बनने के साथ ही देश की राजनीति में जनरेशनल शिफ्ट की बहस तेज हो गई है। मंच से नरेंद्र मोदी का यह कहना कि “नितिन नवीन मेरे बॉस हैं और मैं कार्यकर्ता”—सिर्फ एक राजनीतिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि नेतृत्व परिवर्तन का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है। 75 साल के इतिहास वाली भाजपा ने अपनी स्थापना के 45वें वर्ष में युवा नेतृत्व को शीर्ष पर बैठाकर बड़ा संदेश दिया है।
यह बदलाव विपक्ष—खासतौर पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस—के लिए भी आईना है। सवाल उठता है कि 83 वर्षीय नेतृत्व के साये में चल रही ग्रैंड ओल्ड पार्टी क्या इस संकेत को समझ रही है? दिलचस्प यह है कि कांग्रेस ने यह चिंतन चार साल पहले ही कर लिया था, पर उसे लागू करना भूल गई।
उदयपुर चिंतन शिविर: नारा बना, नीति नहीं
मई 2022 में कांग्रेस ने उदयपुर चिंतन शिविर में ‘50 अंडर 50’ का नारा दिया था—मतलब संगठन और चुनावी पदों पर 50% हिस्सेदारी 50 साल से कम उम्र के नेताओं को। मगर यह नारा व्यवहार में उतर नहीं सका। कांग्रेस में 50 से कम उम्र के 1–2 चेहरों को छोड़ दें तो व्यापक नेतृत्व परिवर्तन नहीं दिखा। इसके उलट भाजपा ने एक झटके में शीर्ष नेतृत्व युवा हाथों में सौंप दिया।
एक मीडिया रिपोर्ट में नाम न छापने की शर्त पर भाजपा नेता का कथन—“सुबह-शाम गोली खाने वाला व्यक्ति ज्यादा दौड़-भाग नहीं कर सकता”—केंद्रीय नेतृत्व की सोच को रेखांकित करता है: ऊर्जा, गति और संगठनात्मक क्षमता।
कांग्रेस की संरचना: उम्र का बोझ
कांग्रेस के आंकड़े खुद कहानी कहते हैं—
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कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) के 85 सदस्यों (स्थायी+विशेष आमंत्रित) में केवल 14% ही 50 साल से कम उम्र के हैं।
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36 सदस्यीय CWC की औसत आयु 67 साल है।
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34 स्थायी आमंत्रित सदस्यों की औसत आयु 61 साल, जबकि 15 विशेष आमंत्रित सदस्यों की औसत आयु 52 साल है।
कुल मिलाकर नेतृत्व की औसत आयु 60 साल के आसपास बैठती है—यानी रिटायरमेंट लाइन कहीं नहीं दिखती।
यह स्थिति उदयपुर प्रस्ताव के ठीक उलट है, जिसमें कहा गया था कि CWC से लेकर मंडल स्तर तक 50% पदाधिकारी 50 साल से कम उम्र के होंगे।
चुनावी नतीजे और संगठनात्मक कमजोरी
कई चुनावी झटकों के बावजूद कांग्रेस उदयपुर घोषणा को गंभीरता से लागू नहीं कर पाई। मध्य प्रदेश और राजस्थान में बुजुर्ग बनाम युवा की खींचतान दिखी, पर दिशा नहीं बदली। हाल में बिहार में 61 सीटों पर लड़कर सिर्फ 6 जीत—यह संकेत देता है कि समस्या सिर्फ फेस की नहीं, संगठनात्मक क्षमता की भी है। पार्टी युवा चेहरों की जरूरत तो महसूस करती है, पर भरोसा फिर पुराने, स्थापित नेताओं पर ही टिक जाता है—और पार्टी उसी चक्रव्यूह में फंस जाती है।
जहां कांग्रेस सत्ता में है: उम्र का पैटर्न
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तेलंगाना: सीएम रेवंत रेड्डी (56); मंत्रियों की औसत आयु 61—15 में से कोई 50 से कम नहीं।
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कर्नाटक: सीएम सिद्धारमैया (77); मंत्रियों की औसत आयु 65—22 में सिर्फ प्रियंक खरगे (47) 50 से कम।
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हिमाचल प्रदेश: सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू (61); कैबिनेट औसत 59—50 से कम तीन मंत्री, सबसे उम्रदराज 85।
एक सकारात्मक संकेत
कांग्रेस के राज्य अध्यक्षों की औसत उम्र करीब 58 है। असम (गोगोई—43), छत्तीसगढ़ (दीपक बैज—44), गोवा (अमित पाटकर—41), गुजरात (अमित चावड़ा—49), हिमाचल (विनय कुमार—47) और पंजाब (अमरिंदर सिंह राजा वारिंग—48) जैसे राज्यों में युवा नेतृत्व दिखता है। मगर शीर्ष पर वही ऊर्जा नहीं पहुंच पाती।
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