महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर शिवसेना के भीतर संभावित टूट की चर्चाओं ने राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। हाल के घटनाक्रमों ने यह संकेत दिया है कि शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है। हालांकि अभी तक किसी प्रकार का आधिकारिक फैसला सामने नहीं आया है, लेकिन पार्टी के सांसदों और विधायकों से जुड़ी गतिविधियां कई सवाल खड़े कर रही हैं।
14 जून को शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने अपने निवास ‘मातोश्री’ पर पार्टी के लोकसभा सांसदों की बैठक बुलाई थी। पार्टी के नौ सांसदों में से केवल चार सांसद ही बैठक में पहुंचे। इसके बाद राजनीतिक चर्चाओं का दौर तेज हो गया। अब 18 जून को नई दिल्ली में पार्टी के मुख्य सचेतक अनिल देसाई द्वारा बुलाई गई बैठक पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
संजय राऊत के बयान से बढ़ीं अटकलें
शिवसेना (यूबीटी) के वरिष्ठ नेता संजय राऊत ने 16 जून को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा करते हुए दावा किया कि महाराष्ट्र के सांसदों को कथित तौर पर 15-15 करोड़ रुपये का प्रस्ताव दिया जा रहा है। हालांकि इस दावे की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इससे राजनीतिक चर्चाओं को और बल मिला है।
इसी बीच ऐसी खबरें भी सामने आई हैं कि पार्टी के कुछ विधायक और सांसद एकनाथ शिंदे गुट के संपर्क में हो सकते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में इस संभावित राजनीतिक गतिविधि को “ऑपरेशन टाइगर” नाम दिया गया है।
लोकसभा में भी बढ़ी राजनीतिक सक्रियता
लोकसभा में शिवसेना (यूबीटी) के नेता अरविंद सावंत ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर मांग की है कि संसद में केवल शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) को ही एक राजनीतिक दल के रूप में मान्यता दी जाए। उन्होंने यह भी आग्रह किया कि किसी भी अलग या बागी गुट को सुविधा देने से पहले मूल पार्टी का पक्ष सुना जाए।
इस घटनाक्रम ने शिवसेना की आंतरिक स्थिति को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
शिवसेना के इतिहास में कई बार आई टूट
शिवसेना की स्थापना 19 जून 1966 को बालासाहेब ठाकरे ने की थी। लंबे समय तक पार्टी का संचालन मजबूत केंद्रीय नेतृत्व के तहत हुआ। हालांकि समय के साथ पार्टी को कई बड़े विभाजनों का सामना करना पड़ा।
छगन भुजबल का अलग होना
1990 के दशक की शुरुआत में छगन भुजबल ने शिवसेना से अलग राह चुनी। उस समय उन्हें पार्टी का प्रभावशाली ओबीसी चेहरा माना जाता था। उनके अलग होने को शिवसेना की पहली बड़ी राजनीतिक दरार माना जाता है।
नारायण राणे का प्रस्थान
साल 2005 में नारायण राणे ने भी शिवसेना छोड़ दी। नेतृत्व और राजनीतिक भूमिका को लेकर मतभेदों की चर्चा उस समय व्यापक रही। राणे के जाने से पार्टी को संगठनात्मक स्तर पर बड़ा झटका लगा।
राज ठाकरे ने बनाई मनसे
साल 2006 में बालासाहेब ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने शिवसेना से अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) का गठन किया। यह शिवसेना के इतिहास की सबसे चर्चित टूटों में से एक थी। राज ठाकरे के अलग होने से मराठी वोट बैंक में विभाजन की स्थिति बनी।
2022 का विभाजन बना सबसे बड़ा झटका
शिवसेना के इतिहास की सबसे बड़ी टूट साल 2022 में देखने को मिली। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायक अलग हो गए। इसके बाद पार्टी दो प्रमुख गुटों में बंट गई।
एक गुट उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में रहा, जबकि दूसरा गुट एकनाथ शिंदे के साथ चला गया। यह विवाद संगठन, चुनाव चिन्ह और राजनीतिक पहचान तक पहुंचा। बाद में शिंदे गुट ने भाजपा के समर्थन से महाराष्ट्र में सरकार बनाई।
बार-बार क्यों होती है टूट?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, शिवसेना में समय-समय पर सामने आने वाले मतभेदों के पीछे कई कारण रहे हैं। इनमें नेतृत्व की भूमिका, सत्ता में हिस्सेदारी, टिकट वितरण, गठबंधन की राजनीति और संगठनात्मक संतुलन प्रमुख हैं।
बालासाहेब ठाकरे के दौर में पार्टी का नेतृत्व अत्यंत केंद्रीकृत था। वहीं, बदलते राजनीतिक परिदृश्य में विभिन्न नेताओं की महत्वाकांक्षाएं और राजनीतिक समीकरण भी बदलते गए। इसका असर समय-समय पर पार्टी की एकता पर दिखाई देता रहा।
आगे क्या होगा?
फिलहाल शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) में संभावित टूट को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन सांसदों और विधायकों से जुड़ी चर्चाओं ने राजनीतिक माहौल को गर्म जरूर कर दिया है।
18 जून की बैठक और आने वाले दिनों की राजनीतिक गतिविधियां यह तय करेंगी कि मौजूदा चर्चाएं केवल अटकलें हैं या महाराष्ट्र की राजनीति किसी नए घटनाक्रम की ओर बढ़ रही है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि शिवसेना के भीतर चल रही हलचल पर पूरे देश की नजर बनी हुई है।
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