भारत के विकास की कहानी केवल आर्थिक आंकड़ों तक सीमित नहीं है। देश की प्रगति में शिक्षा, स्वास्थ्य और विज्ञान से जुड़े संस्थानों की भी बड़ी भूमिका रही है। स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जिन संस्थानों की नींव रखी, उन्हें आगे बढ़ाने और विस्तार देने का काम बाद की सरकारों ने किया। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भी कई महत्वपूर्ण संस्थानों का विस्तार हुआ है। ऐसे में अक्सर यह सवाल उठता है कि नेहरू और मोदी के दौर में IIT, AIIMS और ISRO जैसे संस्थानों की यात्रा कैसे आगे बढ़ी।
नेहरू की सोच: संस्थान बनेंगे तो देश मजबूत होगा
पंडित जवाहरलाल नेहरू का मानना था कि किसी भी देश की मजबूती उसके संस्थानों से तय होती है। उन्होंने वैज्ञानिक सोच, उच्च शिक्षा और अनुसंधान को राष्ट्र निर्माण का आधार माना। यही कारण था कि उनके कार्यकाल में कई बड़े शैक्षणिक और वैज्ञानिक संस्थानों की स्थापना हुई।
नेहरू ने देश को आधुनिक भारत की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए तकनीकी शिक्षा, चिकित्सा और वैज्ञानिक अनुसंधान को प्राथमिकता दी। उनके इसी दृष्टिकोण का परिणाम था कि भारत को IIT, AIIMS और अंतरिक्ष अनुसंधान जैसी महत्वपूर्ण व्यवस्थाएं मिलीं।
IIT ने भारत को दिए विश्वस्तरीय इंजीनियर
भारत में पहला IIT वर्ष 1951 में खड़गपुर में स्थापित किया गया था। इसके बाद मुंबई, मद्रास, कानपुर और दिल्ली में भी IIT शुरू किए गए। इन संस्थानों का उद्देश्य देश में उच्च स्तरीय तकनीकी शिक्षा उपलब्ध कराना था।
आज IIT के पूर्व छात्र दुनिया की बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों, स्टार्टअप्स और अनुसंधान संस्थानों में नेतृत्व कर रहे हैं। IIT ने भारत को वैश्विक तकनीकी पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
मोदी सरकार में बढ़ा IIT नेटवर्क
वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के समय देश में 16 IIT थे। पिछले वर्षों में यह संख्या बढ़कर 23 हो गई। पलक्कड़, तिरुपति, भिलाई, गोवा, जम्मू और धारवाड़ जैसे नए IIT संस्थान स्थापित किए गए।
इसके साथ ही इंजीनियरिंग सीटों की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इससे छोटे शहरों और दूरदराज के राज्यों के छात्रों को बेहतर अवसर मिले। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि नए IIT को पुराने संस्थानों के समान स्तर तक पहुंचने में समय लगेगा।
AIIMS ने स्वास्थ्य क्षेत्र में बदली तस्वीर
देश का पहला अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) वर्ष 1956 में नई दिल्ली में स्थापित हुआ। इसका उद्देश्य विश्वस्तरीय चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना था।
AIIMS दिल्ली आज भी देश के सबसे प्रतिष्ठित सरकारी अस्पतालों में गिना जाता है। यहां लाखों मरीज उपचार के लिए आते हैं और हजारों डॉक्टर प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं।
नए राज्यों तक पहुंचा AIIMS मॉडल
मोदी सरकार ने AIIMS मॉडल को देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाने का प्रयास किया। गोरखपुर, देवघर, राजकोट, गुवाहाटी, नागपुर और बिलासपुर सहित कई शहरों में नए AIIMS स्थापित किए गए।
इसके साथ ही मेडिकल कॉलेजों और MBBS सीटों की संख्या में भी बड़ी वृद्धि हुई। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इससे देश के स्वास्थ्य ढांचे को मजबूती मिली है। हालांकि नए संस्थानों में डॉक्टरों और विशेषज्ञों की उपलब्धता अभी भी चुनौती बनी हुई है।
ISRO की नींव नेहरू काल में पड़ी
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) का गठन वर्ष 1969 में हुआ था, लेकिन इसकी बुनियादी सोच नेहरू काल में विकसित हुई थी। वर्ष 1962 में भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति का गठन किया गया था, जिसने आगे चलकर ISRO का रूप लिया।
विक्रम साराभाई और होमी भाभा जैसे वैज्ञानिकों को नेहरू सरकार का समर्थन मिला। यही वैज्ञानिक आधार बाद में भारत की अंतरिक्ष सफलता की वजह बना।
मोदी काल में अंतरिक्ष कार्यक्रम को मिली नई गति
नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भारत की अंतरिक्ष उपलब्धियां वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बनीं। चंद्रयान-3 की सफल लैंडिंग, आदित्य-L1 मिशन और निजी क्षेत्र के लिए स्पेस सेक्टर खोलना महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल हैं।
सरकार ने नई स्पेस पॉलिसी लागू कर निजी कंपनियों को भी अंतरिक्ष क्षेत्र में अवसर दिए। इससे भारतीय स्पेस स्टार्टअप्स को नई दिशा मिली है।
भारत के सामने अब क्या चुनौती है?
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नए संस्थान खोलना पर्याप्त नहीं है। उनकी गुणवत्ता, अनुसंधान क्षमता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
नए IIT को विश्वस्तरीय बनाना, नए AIIMS में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करना और अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों को मजबूत करना आने वाले वर्षों की प्रमुख चुनौतियां होंगी।
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