उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले इंडिया गठबंधन में सीट शेयरिंग को लेकर खींचतान सामने आ रही है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनाव में साथ उतरने की तैयारी में हैं, लेकिन सीटों के बंटवारे पर दोनों दलों के बीच सहमति बनना चुनौती बना हुआ है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक कांग्रेस 150 से अधिक विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की मांग कर रही है, जबकि समाजवादी पार्टी ज्यादा सीटें अपने पास रखने के पक्ष में है।
सपा की चिंता कांग्रेस के पिछले विधानसभा चुनावों के प्रदर्शन को लेकर बताई जा रही है। वहीं, कांग्रेस 2024 के लोकसभा चुनाव में अपने प्रदर्शन और गठबंधन की सफलता को आधार बनाकर अधिक सीटों की मांग कर रही है।
UP Election 2027: कांग्रेस की 150 सीटों की मांग क्यों?
उत्तर प्रदेश में विधानसभा की कुल 403 सीटें हैं। कांग्रेस की ओर से 150 से अधिक सीटों की मांग का मतलब विधानसभा की करीब एक तिहाई सीटों पर चुनाव लड़ना होगा।
कांग्रेस के पक्ष में सबसे मजबूत आंकड़ा 2024 का लोकसभा चुनाव है। उस चुनाव में पार्टी ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में 17 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा था। कांग्रेस ने इनमें से 6 सीटों पर जीत हासिल की। पार्टी को अमेठी, रायबरेली, बाराबंकी, सीतापुर, सहारनपुर और इलाहाबाद सीटों पर सफलता मिली।
2024 में कांग्रेस का स्ट्राइक रेट 35 फीसदी
2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 17 में से 6 सीटें जीतीं। इस लिहाज से उसका जीत का स्ट्राइक रेट करीब 35 फीसदी रहा। गठबंधन के प्रदर्शन में कांग्रेस की भूमिका को इसी वजह से अहम माना गया।
हालांकि लोकसभा चुनाव के आंकड़ों को विधानसभा चुनाव के लिए सीधे आधार बनाना सपा के लिए आसान नहीं है। विधानसभा चुनाव में सीटों की संख्या, स्थानीय समीकरण और उम्मीदवारों का प्रभाव अलग होता है।
2022 में कांग्रेस का प्रदर्शन रहा कमजोर
2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ा था। पार्टी ने 403 में से 399 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। लेकिन उसे केवल 2 सीटों पर जीत मिली।
कांग्रेस ने रामपुर खास और फरेंदा विधानसभा सीट पर जीत दर्ज की थी। चुनाव में पार्टी का वोट शेयर करीब 2.33 फीसदी रहा और उसे लगभग 21.51 लाख वोट मिले।
करीब 10 सीटों पर NOTA से भी कम वोट
2022 के चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन इतना कमजोर रहा कि करीब 10 विधानसभा सीटों पर पार्टी के उम्मीदवारों को NOTA से भी कम वोट मिले। यही आंकड़े आगामी सीट बंटवारे में समाजवादी पार्टी की चिंता का प्रमुख आधार माने जा रहे हैं।
सपा के सामने सवाल यह है कि अगर कांग्रेस को 150 से अधिक सीटें दी जाती हैं, तो क्या वह इन सीटों पर प्रभावी मुकाबला कर पाएगी।
2017 में सपा-कांग्रेस गठबंधन का क्या हुआ था?
2017 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने गठबंधन करके चुनाव लड़ा था। उस समय दोनों दलों की ओर से गठबंधन को लेकर व्यापक प्रचार किया गया था। कांग्रेस ने 114 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा।
लेकिन नतीजे गठबंधन के पक्ष में नहीं रहे। कांग्रेस को केवल 7 सीटों पर जीत मिली और उसका वोट शेयर करीब 6.25 फीसदी रहा। समाजवादी पार्टी भी चुनाव में सत्ता बरकरार नहीं रख सकी।
इस चुनाव ने दोनों दलों के बीच विधानसभा स्तर पर सीट बंटवारे की चुनौती को पहले भी सामने रखा था।
2019 लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस का प्रदर्शन कमजोर
2019 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का प्रदर्शन निराशाजनक रहा था। पार्टी को राज्य में केवल एक लोकसभा सीट पर जीत मिली। उसका वोट शेयर करीब 6.31 से 6.36 फीसदी के बीच रहा।
इसके मुकाबले 2024 में कांग्रेस ने गठबंधन के तहत बेहतर प्रदर्शन किया और छह लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की। यही अंतर 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए सीट शेयरिंग की बातचीत में महत्वपूर्ण बन गया है।
सपा के सामने 2027 में जीत की चुनौती
समाजवादी पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव में सत्ता में वापसी की कोशिश कर रही है। पार्टी के लिए गठबंधन का सामाजिक और चुनावी आधार मजबूत करना अहम है। ऐसे में ज्यादा सीटें कांग्रेस को देने से उम्मीदवारों के चयन और सीटों पर संगठनात्मक तैयारी को लेकर सपा के सामने चुनौती बढ़ सकती है।
दूसरी ओर, कांग्रेस 2024 के लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत होने के संकेत के तौर पर देख सकती है। पार्टी की कोशिश विधानसभा चुनाव में भी अपनी सीटों की संख्या बढ़ाने की है।
सीट शेयरिंग पर आंकड़ों का असर
उत्तर प्रदेश के पिछले चुनावी आंकड़े कांग्रेस के प्रदर्शन में बड़ा उतार-चढ़ाव दिखाते हैं। 2017 में गठबंधन के बावजूद कांग्रेस 7 सीटों तक सीमित रही। 2019 में उसे एक लोकसभा सीट मिली। 2022 में अकेले चुनाव लड़ने पर वह सिर्फ 2 विधानसभा सीटें जीत सकी। इसके बाद 2024 में गठबंधन के साथ कांग्रेस ने 6 लोकसभा सीटें जीतीं।
ऐसे में UP Election 2027 से पहले सीट शेयरिंग का सवाल केवल संख्या का नहीं, बल्कि पिछले चुनावी प्रदर्शन और मौजूदा राजनीतिक समीकरण का भी है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच अंतिम समझौता किन सीटों और कितनी संख्या पर होता है, यह आगामी चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।
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