ईरान जंगईरान जंग

ईरान के साथ जारी तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़ा यू-टर्न लिया है। पहले “शक्ति के जरिए शांति” की बात करने वाले ट्रंप ने अब सैन्य कार्रवाई से पीछे हटते हुए सीजफायर पर बातचीत की पुष्टि की है।

ट्रंप के अनुसार, ईरान के साथ संघर्ष विराम को लेकर बातचीत जारी है और यह प्रक्रिया पूरे सप्ताह चल सकती है। इस दौरान ईरान के किसी भी ऊर्जा ठिकानों पर हमला नहीं किया जाएगा।

8 घंटे में बदला रुख

जानकारी के अनुसार, सोमवार सुबह तक ट्रंप जंग को आगे बढ़ाने के पक्ष में थे। हालांकि, महज 8 घंटे के भीतर उन्होंने अपना रुख बदल लिया और सीजफायर की दिशा में कदम बढ़ा दिए।

ईरान के सरकारी मीडिया ने इसे अमेरिका की “पीछे हटने” की स्थिति बताया है। वहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस फैसले को रणनीतिक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।

जंग में अमेरिका पर बढ़ा दबाव

करीब 24 दिनों तक चले संघर्ष में ईरान ने ड्रोन, मिसाइल और होर्मुज स्ट्रेट का प्रभावी इस्तेमाल किया। इससे अमेरिका पर सैन्य और रणनीतिक दबाव बढ़ गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि जंग को आगे बढ़ाने के लिए अमेरिका को जमीनी सैनिक भेजने पड़ते, जो एक बड़ा और जोखिम भरा फैसला होता।

अगर अमेरिकी सैनिकों को नुकसान होता, तो इसका राजनीतिक असर भी ट्रंप प्रशासन पर पड़ सकता था।

खुफिया आकलन हुआ फेल

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जंग की शुरुआत में इजराइली खुफिया एजेंसी मोसाद ने अमेरिकी नेतृत्व को एक रणनीति पेश की थी। इसमें दावा किया गया था कि शुरुआती हमलों के बाद ईरान की जनता सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आएगी।

हालांकि, यह आकलन सही साबित नहीं हुआ। ईरान में कोई बड़ा जनविरोध नहीं हुआ, जिससे अमेरिका और इजराइल की रणनीति कमजोर पड़ गई।

खाड़ी देशों का दबाव पड़ा भारी

अमेरिका पर खाड़ी देशों का दबाव भी लगातार बढ़ रहा था। ओमान, कतर और सऊदी अरब जैसे देशों ने साफ संकेत दिए कि इस जंग का असर उनके आर्थिक हितों पर पड़ रहा है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इन देशों ने अमेरिका को चेतावनी दी थी कि यदि संघर्ष बढ़ता है, तो वे अपने संबंधों की समीक्षा कर सकते हैं।

इसके अलावा, ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई की तैयारी कर ली थी। संभावित हमलों में खाड़ी देशों के तेल और गैस ठिकाने निशाने पर हो सकते थे।

होर्मुज स्ट्रेट बना बड़ा कारण

होर्मुज स्ट्रेट इस पूरे संघर्ष का सबसे संवेदनशील बिंदु बन गया। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति मार्गों में से एक है।

वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने अपने सुरक्षा सलाहकारों के साथ इस मुद्दे पर चर्चा की। उन्हें बताया गया कि यहां युद्धपोत भेजना जोखिम भरा हो सकता है।

संकरा समुद्री मार्ग होने के कारण यहां किसी भी सैन्य टकराव से वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हो सकती थी। इससे दुनिया भर में आर्थिक संकट पैदा हो सकता था।

अंतरराष्ट्रीय समर्थन की कमी

ट्रंप को उम्मीद थी कि नाटो और अन्य सहयोगी देश इस संघर्ष में अमेरिका का साथ देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

किसी भी प्रमुख देश ने खुलकर समर्थन नहीं दिया, खासकर होर्मुज क्षेत्र में सैन्य कार्रवाई के मुद्दे पर। इससे अमेरिका कूटनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ता नजर आया।

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