सामाजिक समरसतासामाजिक समरसता

दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल महाविद्यालय में ‘भारत मंथन 2026’ के तीसरे दिन सामाजिक समरसता  विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम इंद्रप्रस्थ अध्ययन केंद्र सहित कई प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया।

यह संगोष्ठी 6 अप्रैल से 11 अप्रैल 2026 तक आयोजित ‘भारत मंथन 2026’ श्रृंखला का हिस्सा है, जिसका मुख्य विषय “मानव कल्याण के परिप्रेक्ष्य में पंच परिवर्तन का क्रियान्वयन: चुनौतियाँ व समाधान” है।

दीप प्रज्ज्वलन के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ

कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक दीप प्रज्ज्वलन और सरस्वती वंदना के साथ हुई। इस अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में श्री मिथिलेश कुमार (सह बौद्धिक शिक्षण प्रमुख, उत्तर क्षेत्र) और सत्राध्यक्ष के रूप में प्रो. दिनेश खट्टर (प्राचार्य, किरोड़ीमल महाविद्यालय) उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. रूपेश कुमार चौहान ने किया, जिन्होंने विषय की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला और वक्ताओं का परिचय कराया।

‘मैं’ से ‘हम’ की ओर बढ़ने का संदेश

सत्राध्यक्ष प्रो. दिनेश खट्टर ने अपने संबोधन में कहा कि समाज के समग्र विकास के लिए ‘मैं’ से ऊपर उठकर ‘हम’ की भावना को अपनाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि समरस समाज का निर्माण तभी संभव है जब व्यक्ति सामूहिक चेतना के साथ जुड़कर कार्य करे।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत मंथन जैसे आयोजन समाज को सोचने, समझने और सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।

भारतीय चिंतन परंपरा में भेदभाव का स्थान नहीं

मुख्य वक्ता श्री मिथिलेश कुमार ने भारतीय चिंतन परंपरा पर विस्तार से अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि भारत की मूल विचारधारा आत्मतत्त्व के साक्षात्कार पर आधारित है, जिसमें किसी भी प्रकार के भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं है।

उन्होंने कहा, “भारतीय संस्कृति का मूल भाव ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ है, जो सभी को समान दृष्टि से देखने की प्रेरणा देता है।”

उन्होंने आगे बताया कि इतिहास में जब-जब समाज में भेदभाव बढ़ा, तब-तब नई चिंतन धाराएं सामने आईं। गौतम बुद्ध, महावीर और आदि शंकराचार्य जैसे महापुरुषों ने समाज को नई दिशा दी।

भारत मंथन की आवश्यकता पर जोर

इंद्रप्रस्थ अध्ययन केंद्र के प्रमुख श्री विनोद शर्मा ‘विवेक’ ने भारत मंथन की अवधारणा और इसकी यात्रा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में इस प्रकार के बौद्धिक मंथन की आवश्यकता पहले से अधिक है।

उन्होंने बताया कि ‘पंच परिवर्तन’ के माध्यम से समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास किया जा रहा है, जिसमें सामाजिक समरसता एक महत्वपूर्ण पहलू है।

प्रमुख हस्तियों की रही उपस्थिति

कार्यक्रम में कई शिक्षाविद और गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। इनमें प्रो. राकेश कुमार पांडेय, श्री अजेय जी, प्रो. सुनील कश्यप, प्रो. ममता शर्मा, डॉ. मुकेश मिश्रा और प्रो. प्रदीप प्रमुख रहे।

इन सभी ने अपने-अपने क्षेत्र में समाज और शिक्षा के विकास में योगदान दिया है। उनकी उपस्थिति ने कार्यक्रम की गरिमा को और बढ़ाया।

शोध प्रस्तुतियों में दिखी सक्रिय भागीदारी

संगोष्ठी के दौरान दो समानांतर सत्रों में शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए। दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के विभिन्न संस्थानों से आए शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने इसमें भाग लिया।

कुल 45 पंजीकृत प्रतिभागियों में से 27 प्रतिभागियों ने अपने शोध प्रस्तुत किए। इन प्रस्तुतियों में सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक एकता और समाज के विकास से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई।

विशेषज्ञों ने प्रतिभागियों को उनके शोध कार्य पर महत्वपूर्ण सुझाव दिए, जिससे उन्हें आगे के शोध में मदद मिलेगी।

समरस समाज निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल

यह संगोष्ठी न केवल एक अकादमिक कार्यक्रम रही, बल्कि समाज में समरसता और एकता को बढ़ावा देने का एक प्रभावी मंच भी बनी।

कार्यक्रम के अंत में प्रो. राकेश कुमार पांडेय ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया और सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।

‘भारत मंथन 2026’ के अंतर्गत आयोजित यह तीसरा दिन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ, जिसने सामाजिक समरसता जैसे महत्वपूर्ण विषय पर व्यापक चर्चा को आगे बढ़ाया।

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