अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाने जाते हैं, आज एक बड़ी बहस का केंद्र बने हुए हैं। केंद्र सरकार की ₹81,000 करोड़ की ग्रेट निकोबार परियोजना ने विकास और पर्यावरण के बीच एक नई जंग छेड़ दी है। जहाँ सरकार इसे भारत की सुरक्षा और व्यापार के लिए गेम-चेंजर मान रही है, वहीं विपक्ष और पर्यावरणविद इसे एक बड़ा खतरा बता रहे हैं।
क्यों खास है ग्रेट निकोबार की लोकेशन?
ग्रेट निकोबार द्वीप की सबसे बड़ी ताकत इसकी भौगोलिक स्थिति है। यह द्वीप इंडोनेशिया के सुमात्रा के बेहद करीब है। यह दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्ग ’10 डिग्री चैनल’ के पास स्थित है।
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व्यापार का केंद्र: दुनिया का लगभग 90% समुद्री व्यापार हिंद महासागर से होता है।
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सामरिक महत्व: यहाँ से भारत मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) जैसी संकरी जगहों पर नज़र रख सकता है, जहाँ से वैश्विक तेल और माल की सप्लाई होती है।
क्या है इस मेगा प्रोजेक्ट के अंदर?
नीति आयोग की इस योजना का लक्ष्य ग्रेट निकोबार को ‘सिंगापुर’ या ‘हांगकांग’ जैसा बनाना है। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
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इंटरनेशनल पोर्ट: जहाजों के सामान उतारने के लिए एक विशाल बंदरगाह।
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इंटरनेशनल एयरपोर्ट: दुनिया भर से सीधी कनेक्टिविटी के लिए हवाई अड्डा।
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स्मार्ट सिटी: रहने के लिए आधुनिक सुविधाओं से लैस एक नया शहर।
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टूरिज्म हब: पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए विशेष इंफ्रास्ट्रक्चर।
चीन की चुनौती और भारत की तैयारी
हिंद महासागर में चीन की बढ़ती सक्रियता भारत के लिए बड़ी चिंता है। चीन ने म्यांमार के कोको द्वीप और श्रीलंका में अपनी पकड़ मजबूत की है। ऐसे में ग्रेट निकोबार में मजबूत सैन्य और व्यापारिक उपस्थिति भारत को चीन के खिलाफ एक रणनीतिक बढ़त (Strategic Edge) दिलाएगी।
सोनिया गांधी और पर्यावरणविदों की आपत्ति
कांग्रेस सांसद सोनिया गांधी ने इस प्रोजेक्ट पर कड़ा विरोध जताया है। उनका कहना है कि विकास की इस दौड़ में हम बहुत कुछ खो सकते हैं:
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लाखों पेड़ों की बलि: रिपोर्टों के अनुसार, परियोजना के लिए 8.5 लाख से 58 लाख तक पेड़ काटे जा सकते हैं।
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आदिवासी अधिकार: यहाँ रहने वाली शोम्पेन (Shompen) और निकोबारी जनजातियों के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है। शोम्पेन जनजाति बाहरी दुनिया से कटी हुई है और उनकी संख्या बेहद कम है।
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दुर्लभ जीव: यहाँ ‘निकोबार मेगापोड’ पक्षी और ‘लेदरबैक कछुए’ पाए जाते हैं, जो दुनिया में दुर्लभ हैं। निर्माण कार्य से इनका प्राकृतिक आवास खत्म हो सकता है।
सुनामी और प्राकृतिक आपदा का डर
ग्रेट निकोबार भूकंप के लिहाज से बेहद संवेदनशील है। 2004 की सुनामी ने यहाँ तबाही मचाई थी, जिससे द्वीप का कुछ हिस्सा समुद्र में धंस गया था। विशेषज्ञों का सवाल है कि क्या इतने संवेदनशील इलाके में भारी निर्माण करना सुरक्षित होगा?
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